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Thursday, 12 February 2015

बिहार का सही उपाय

                                                              राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने पहले से ही बुलाये गए बिहार विधान सभा के बजट सत्र में पहले दिन ही राज्यपाल के अभिभाषण के बाद जिस तरह से बिहार के सीएम जीतनराम मांझी को सदन का विश्वास लेने के लिए कहा है वह संवैधानिक रूप से अपने आप में बिलकुल सही कदम है पर इसकी भी सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा अपने अपने हिसाब से व्याख्या की जाती रहेगी क्योंकि इसमें जहाँ सीएम को अपने पत्ते खेलने के लिए पूरा समय मिल गया है वहीं नितीश के सामने यह बड़ी चुनौती आ गयी है कि वे इतने दिनों तक अपने विधायकों को किस तरह से अपने साथ रख पाने में सफल होते हैं. इस तरह के मामलों में जहाँ संविधान में पूरा मामला राज्यपाल के विवेक पर छोड़ा गया है अभी तक जिस तरह से मामला आगे बढ़ रहा है उसमें यही लगता है कि कोर्ट के इस तरह के विधायी कार्यों में दखल ने देने के कारण ही दोनों पक्षों के लिए अतिरिक्त अवसर समाप्त हो गए पर यहीं से उस राजनैतिक जोड़तोड़ का आरम्भ भी होने वाला है जो सदन में किसी भी दल को अगले चुनाव तक सत्ता में बैठने का अवसर दे सकता है. यह सीमित समय की सत्ता जहाँ जेडीयू के लिए चुनौती तो मांझी के लिए एक बेहतर अवसर साबित हो सकती है.
                                         इस मसले में कभी लो प्रोफाइल नेता रहे मांझी के लिए फिलहाल सब तरफ से जीत ही दिख रही है यदि वे भाजपा के साथ किसी भी तरह से नितीश लालू गट से कुछ अपने प्रति सहानुभूति रखने वाले विधायकों को गुप्त मतदान होने की दशा में एकजुट रखने में सफल हो गए तो आगामी चुनावों तक सत्ता उनके हाथों में ही रहने वाली है पर चुनाव पूर्व या चुनाव के समय वे भाजपा के साथ किस तरह का मोलभाव कर पाते हैं यह उनके राजनैतक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होने वाला है. भाजपा के लिए मांझी का अभी बना रहना जहाँ अच्छा कहा जा सकता है वहीं चुनाव के समय मांझी से किनारा करने या उन्हें बिहार भाजपा में शामिल करने से क्या दिल्ली भाजपा जैसा कुछ होने से इंकार नहीं किया जा सकता है ? मांझी अगर अभी जेडीयू के लिए समस्या हैं तो आने वाले समय में वे शाह-मोदी के लिए भी समस्या बन सकते हैं. आज जिस महादलित की उपेक्षा पर भाजपा मुखर हो रही है कल वही तीर उसके खिलाफ भी जा सकते हैं. मांझी के लिए भाजपा के पास एक विकल्प उन्हें भाजपा में शामिल कराकर आने वाले चुनावों से पहले ही केंद्र में मंत्री बनाकर उपयोग में लाया जा सकता है और संभवतः यह मांझी और भाजपा के लिए सबसे आदर्श स्थिति होने वाली है.
                                जेडीयू के पास जिस तरह से लालू-नितीश की जोड़ी और बिहार में ढाई दशकों से हाशिये पर पहुंची कांग्रेस के साथ मिलकर जो गठबंधन बनाने की कोशिशें चल रही हैं उनका कितना सकारात्मक परिणाम सामने आएगा यह तो चुनावों के बाद ही पता चलेगा पर नितीश ने जिस तरह से बिहार को अराजकता से बाहर निकाल कर देश के साथ ही आगे बढ़ने की राह पर बढ़ाया है उससे पूरी परिस्थितियां साफ हैं कि बिहार में उनको एकदम से चुका हुआ भी नहीं माना जा सकता है. यदि मांझी सदन का विश्वास हासिल नहीं कर पाते हैं तो उस स्थिति में नितीश का सीएम बनना तय है और जैसा कि उन्होंने कहना शुरू भी कर दिया है कि मांझी को सत्ता सौपने के बाद से बिहार का विकास रुका है उसमें कुछ हद तक सचचाई भी है. दिल्ली में आप के प्रदर्शन के बाद अब बिहार में गैर भाजपाई दलों को भी यह लगने लगा है कि जेडीयू सरकार के सुशासन और मोदी सरकार की कमियों के बारे में बातकर उनके आभामंडल की चमक को कम कर अपने वोटों को बचाए रखने का मुश्किल काम असंभव नहीं रह गया है. बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य को कब्ज़े में लेने की कोशिशें अब भाजपा और अन्य दलों के बीच में और भी तेज़ी से सामने आने वाली हैं बीस फरवरी को उस कहानी से पर्दा उठने की शुरुवात होने वाली है.      
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