मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 21 April 2015

दक्षिण एशिया में चीन के व्यापारिक-सामरिक हित

                                    अगले महीने भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा से पहले जिस तरह से चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने पाक के साथ अपने देश के महत्वपूर्ण संबंधों को और भी मज़बूत करने के लिए कई कदम उठाये हैं उनमें अधिकांश से भारत की चिंताएं बढ़ने ही वाली हैं क्योंकि भारत पाक के बीच कश्मीर के विवादित और दोनों देशों के बीच बंटे हुए भूभाग का चीन अपने हित में पूरी तरह से इस्तेमाल करने की तरफ बढ़ चुका है. आज चीन दुनिया भर में अपने सस्ते माल को पहुँचाने की जुगत के साथ ही अपने को भविष्य में अमेरिका के बराबर खड़े करने के हर प्रयास के लिए पूरे मनोयोग से जुटा हुआ है जिससे वह अपनी आर्थिक मज़बूती को बनाये रखने के साथ दुनिया भर में अपनी धाक जमाये रख सके. नि:संदेह चीन में एक दीर्घगामी नीति पर चलने का प्रयास किया जा रहा है जिसके माध्यम से वह फिलहाल तो अपनी आर्थिक स्थति को बेहतर बनाने का काम करेगा और बनाये जाने वाले इस ढांचागत विकास से भविष्य में अपनी सामरिक गतिविधियों को भी आवश्यकता अनुसार चलता रहेगा जिससे उसके पास बेहतर विकल्प भी बचे रहने वाले हैं.
                        आर्थिक रूप से खुद को मज़बूत करने में लगे हुए चीन की इस तरह की हरकतों से भारत अनजान हो ऐसा भी नहीं है पर वर्तमान स्थिति में यह चीन को ऐसे किसी भी कदम पर आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता है क्योंकि चीन पाकिस्तान और बांग्लादेश में अपने आर्थिक हितों को साधने के साथ ही वहां पर अपनी पहुँच बढ़ाने में लगा हुआ है. भारतीय परिदृश्य में चीन की इस विस्तारवादी नीति के आगे बढ़ने पर आर्थिक हितों पर चोट पड़ने के साथ ही अरब सागर में उसकी चुनौतियों में भी बहुत बढ़ोत्तरी होने वाली है. ग्वादर बंदरगाह का अभी आर्थिक रूप से विकास किया जाने वाला है जिसके बाद वहां पर जब मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध हो जाएँगी तो उनकी सुरक्षा के लिए चीन अपनी नौसैनिक टुकड़ी की भी तैनाती करने में नहीं चूकने वाला है. वैसे भी पाक में जिस तरह का चरमपंथी माहौल चल रहा है तो उसमें पाक का भविष्य क्या होने वाला है यह किसी को भी नहीं पता है इसलिए भी भविष्य में किसी अचानक से उत्पन्न होने वाली स्थिति में चीन पाक के इस भूभाग पर अपने आर्थिक हितों को संरक्षित करने के बहाने पूरी तरह से कब्ज़ा करने के बारे में भी सोच सकता है.
                         सैन्य और अन्य तरह की सहायता और व्यापारिक सौदेबाज़ी के माध्यम से चीन पाक के साथ पहले ही बहुत आगे बढ़ा हुआ है फिर भी जिस तरह से अब वह नए सिरे से सोचना शुरू कर रहा है उसके निश्चित तौर पर भारत पर विपरीत प्रभाव दिखाई देने वाले हैं क्योंकि चीन भी भारत को उलझाये रखने के लिए ही पाक समर्थित आतंकियों के मुद्दे पर कभी भी कुछ नहीं बोलता है जबकि अपने यहाँ शिनजियांग प्रान्त में वह इस्लामी आतंकियों से बहुत सख्ती से निपटता है. शिनजियांग प्रान्त भी लम्बे समय से इस्लामी आतंकियों के कारण चीन के लिए बड़ा सरदर्द बना हुआ है और उसके लिए इस तरह से एक पूरा मार्ग खुल जाने के बाद वहां चल रही अलगाववादी कोशिशों पर किस तरह से लगाम लगायी जा सकेगी यह भी चीन के लिए बड़ी समस्या साबित हो सकती है. इस्लामी आतंकी समूहों को रोकने के लिए यदि चीन इस आर्थिक गलियारे पर चरमपंथियों पर पाक सरकार के माध्यम से या खुद ही सफल रहता है तो आने वाले समय में उससे भारत भी काफी हद तक सुरक्षित हो सकता है क्योंकि इस गलियारे के आस पास माहौल सुरक्षित किये बिना इसका पूरा दोहन नहीं किया जा सकेगा. भारत के परिदृश्य में अब सरकार को यह सोचना ही होगा कि वह किस तरह से और कहाँ तक अपने चीन के प्रति प्रेम को बनाये रहे और उसकी क्या सीमा हो क्योंकि चीन एक तरफ पाक की कमज़ोरी का लाभ उठाकर वहां अपने को सामरिक दृष्टि से मज़बूत कर रहा है वहीं दूसरी तरफ वह भारत के बड़े आर्थिक बाज़ार पर भी अपनी निगाहें जमाये हुए हैं इसलिए इन परिस्थितियों में भारत की समस्याएं और चुनौतियाँ और भी बढ़ने ही वाली हैं.           
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