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Sunday, 6 March 2016

सरकारी बैंकों का सुदृढ़ीकरण

                                                                        देश की अर्थव्यवस्था में सरकारी बैंकों की स्थिति सदैव ही महत्वपूर्ण रही है क्योंकि इनके राष्ट्रीयकरण के बाद केंद्र सरकार ने अपनी विभिन्न योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए जिस तरह से इनके माध्यम से आम लोगों तक पहुँच बनाने में सफलता पायी है वह अपने आप में देश के बैंकों की एक बड़ी उपलब्धि भी कही जा सकती है. आज जब विभिन्न राजनैतिक कारणों से बैंको के एनपीए में लगातार बढ़ोत्तरी देखी जा रही है तो इस परिस्थिति में सरकार के पास इसे कम करने के सीमित विकल्प ही शेष हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पहुँचने के बाद यह भी संभव है कि बैंकों का बाजार में फंसा हुआ वह पैसा आसानी से निकाल आये जिसे देश के बड़े उद्योगपति नियमों की कमी और अपने राजनैतिक रसूखों के चलते हड़पे बैठे है और इस धन की वापसी के बारे में कोई विचार भी नहीं करना चाहते हैं. अब जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इन लोगों की सूची मांगी गयी है तो यह भी संभव है कि आने वाले समय में ये लोग इस धन की वापसी के बारे में भी सोचना शुरू कर दें क्योंकि पैसे न लौटाने वालों की सूची में बड़े उद्योगपतियों के नाम होने से उनकी अन्य इकाइयों और बाजार में उनकी साख पर भी दुष्प्रभाव पड़ सकता है.
                                                                    इस परिस्थिति में वित्तमंत्री अरुण जेटली का यह प्रस्ताव सही है कि आने वाले समय में बैंकों के सामने उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अब बैंकों का परिचालन बेहतर करने के लिए विलय करना भी आवश्यक हो गया है. उस परिस्थिति में जहाँ बैंकों की प्रबंधन और परिचालन लागत को कम करने में मदद मिल सकती है वहीँ भविष्य में बैंकों में और भी अधिक कुशलता से निर्णय लेने और काम करने की क्षमता को बढ़ाया भी जा सकता है. इस परिस्थिति के लिए यदि सरकार अभी से कड़े और प्रभावी कदम उठाने के बारे में विचार करने के लिए तैयार है तो इन बैंकों को लम्बे समय तक क्रियाशील रखा जा सकता है क्योंकि निजी क्षेत्र के बैंक बेहतर प्रबंधन और सेवाओं के चलते तेज़ी से शहरी ग्राहकों की पहली पसन्द बनते जा रहे हैं तो उस स्थिति से निपटने के लिए सरकारी बैंकों को भी अपनी कार्यशैली में बदलाव कर उनसे कदम मिलाने ही होंगें वर्ना भविष्य में ग्राहक बनाने और उन्हें रोक पाने में सरकारी बैंक पूरी तरह से अप्रभावी सिद्ध हो सकते हैं.
                                                      बैंकों के शीर्ष प्रबंधन में सरकार को अपने लोगों को बैठाने के स्थान पर आर्थिक और वित्तीय समझ रखने वाले लोगों को नियुक्त करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि वे बदलती आर्थिक परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप तेज़ी से निर्णय लेकर बैंकों की तरफ से ग्राहकों को अच्छी सुविधाएँ देने तथा व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए तैयार करने का काम करने से नहीं चूकने वाले हैं. वित्तमंत्री को अपने इस प्रयास को एक समय सीमा के साथ अवलम्ब शुरू करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि विलय और अधिग्रहण समेत बहुत सारे ऐसे मुद्दे भी होते हैं जिन्हें चाहकर भी बहुत शीघ्रता से नहीं निपटाया जा सकता है. सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार भविष्य में भी काम करने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि देश की दूर दराज़ की आबादी की छोटी मोटी मांग को पूरा कर पाने में इन सरकारी बैंकों का ही बहुत बड़ा योगदान है और यदि आने वाले समय में ये अपने पैरों पर खड़े ही नहीं हो पायेंगें तो देश की आर्थिक प्रगति के साथ आम जनता की उम्मीदों पर कैसे खरे उतर पायेंगें ?  
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