मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 14 July 2010

सिमी पर प्रतिबन्ध सही

दिल्ली उच्च न्यायलय में केंद्र सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता ए एस चंडीओक ने कहा कि  देश के मुसलमानों के हित के लिए सिमी पर प्रतिबन्ध जायज़ है. उल्लेखनीय है कि  सन २००१ में पहली बार लगे प्रतिबन्ध को पांचवी बार बढ़ाने पर इसे कोर्ट में चुनौती दी गयी थी. केंद्र सरकार ने कहा कि देश में मुस्लिम समुदाय के हित में इस संगठन पर प्रतिबन्ध लगाना इसलिए सही है क्योंकि यह संगठन कुछ जगहों पर आम मुसलमानों को भड़काने के काम में लिप्त पाया गया था. देश में मुस्लिम आबादी बढ़ी है और उस अनुपात में उनके कल्याण के लिए बराबर योजनायें चलायी जा रही हैं फिर भी यह संगठन मुसलमानों की उपेक्षा करने का आरोप लगता रहा है.
          यहाँ पर सवाल यह नहीं है कि सिमी पर प्रतिबन्ध लगे या नहीं.... बल्कि यह है कि कब तक नेता और सरकारें केवल अपने वोट बैंक को ही देखते हुए देश हितों के साथ समझौता करते रहेंगें ? किसी भी मसले पर समुदाय या धर्म का विचार किये बिना केवल देश हित को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो मसला देश के हित में है वह देश के किसी भी समुदाय के खिलाफ कैसे हो सकता है ? पर कुछ जगहों पर वोट और सत्ता लोलुप नेता केवल अपना हित देखते हुए ऐसी गलत परंपरा डाल देते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं होता और लम्बे समय में वे देश के लिए समस्या बन जाते हैं ? यह सही है कि सिमी के लोग यह कहते थे कि वे मुसलमानों के हितों के लिए काम कर रहे हैं पर उनके किसी भी काम से कौम का क्या भला हुआ यह तो वही जानते होंगें पर उनके बहकावे में आकर देश के बहुत से युवा मुस्लिम लड़कों को जेल भी जाना पड़ा और बहुत से अभी भी छूट नहीं पाए हैं ? ऐसे संगठन का क्या किया जाये जो अपने लोगों को ही जेल का रास्ता दिखा दे ?
          किसी भी समुदाय का हित दूसरे आसानी से नहीं कर पाते हैं पर समुदाय के अन्दर के लोग ही इन सभी बातों का आसानी से फायदा उठा लेते हैं. देश में भाषा के नाम पर झगड़े करने वालों से कोई यह नहीं पूछना चाहता कि आखिर उनका क्या योगदान है उनकी भाषा को आगे बढ़ाने में ? संस्कृत और अरबी उर्दू के नाम पर देश में बहुत बकवास की जा चुकी है पर क्या कोई नहीं जानता कि इन भाषाओं कि उन्नति के लिए चलाये जा रहे केंद्र और बोर्ड ही इन भाषाओं का भट्ठा बैठाने में लगे हुए हैं ? बस इसी तरह से कुछ लोग केवल बहकाने का काम  ही करते रहे हैं और वे अपने स्वार्थ के कारण कभी भी पूरे समुदाय की बातें करना भी नहीं चाहते हैं ? अब समय है कि सिमी जैसे किसी भी संगठन पर प्रतिबन्ध की बातें करते समय केवल यह कहा जाए कि ये देश विरोधी हैं यह कहने से काम नहीं चलने वाला कि ये मुसलमानों के विरोधी हैं और उनके हितों को चोट पहुंचाते हैं ? देश में जो कुछ भी घटता है उससे पूरे देश के नागरिक प्रभावित होते हैं इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता है कि वह किस धर्म से हैं तो फिर हर बात में क्यों धर्म का चश्मा लगाने की आदत हम सभी ने बना रखी है ?   

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