मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

काला धंधा गोरे लोग.....

                   एक ऑनलाइन पत्रिका ने जिस तरह से जर्मनी में कला धन जमा करने वाले भारतीयों की सूची को सामने लाने की कोशिश की है उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहीं से अगर प्रयास किये जांयें तो विदेशों में जमा काले धन को देश में वापस लाया जा सकता है ? पूरी दुनिया में जिस तरह से भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और लगभग सभी देश आज इस समस्या से त्रस्त हैं उसको देखते हुए अब इस बात की बहुत आवश्यकता है कि काला धन जमा करने वाले बैंक वे चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हों उनको भी सम्बंधित देशों को सूचित करना चहिये कि उनके यहाँ किस देश के कितने लोगों का धन जमा है ? यह सब आज सोचने में ऐसा लगता है कि शायद ना हो पाए पर जब जनता का दबाव बढेगा तो इन्हीं सरकारों को इस पूरे मामले को सार्वजनिक करना ही पड़ेगा.
          अभी तक जो भी अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ हैं उनका अपने महत्त्व है पर जब बात काले धन की हो और देश के कीमती संसाधनों की लूट मचाकर यह धन एकत्रित किया जा रहा हो तो देश को किसी भी संधि को नहीं मानना चाहिए ? दुनिया में कितने ही देश हैं जो अपने हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं भले ही उसके कितने ही दूरगामी परिणाम सामने आएं ? देश के होने पर ही संधियाँ बची रहेंगीं वरना इन संधियों को कौन मानेगा ? अभी तक जो कुछ भी चल रहा है वह सब पुराने समय से ही चल आया रहा है और इस मामले में अब इस बहस का कोई मतलब नहीं है कि किस सरकार ने कब कौन सी संधि की थी ? सभी ने देश के संसाधनों को बाहर भेजने का काम किया है और अब अगर ये सभी मिलकर अपनी गलती सुधारना चाहते हैं तो अब देश की सभी अंतर्राष्ट्रीय नीतियों और संधियों की समीक्षा के लिए एक संसदीय समिति, एक कानूनी समिति और एक सम्मानित नागरिकों की समिति अविलम्ब बनाई जानी चाहिए.
        जो गलतियाँ आज तक हुईं हैं उनके लिए रोने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है सरकार को इस मसले पर तुरंत ही संसद के आगामी बजट सत्र में रखने के लिए एक संकल्प को तैयार करना चाहिए जिससे आगे आने वाले समय में कोई भी भारतीय विदेशों में काला धन जमा न कर सके ? स्विटज़रलैंड की सरकार के साथ भारत के कोई बहुत बड़े व्यापारिक समझौते शायद नहीं है फिर किस कानून और संधि की बातें की जाती हैं ? अच्छा ही है कि सरकार ने कोर्ट पर यह बात छोड़ दी है कि वह चाहे तो उन नामों को सार्वजनिक कर दे क्योंकि आज की तारीख़ में सरकार संधियों से बंधी है पर कोर्ट किसी भी सीमा और संधि से नहीं बंधी है ? यही सही समय है कि सभी गलतियों को इसी समय सुधार लिया जाए और देश के पैसे को बाहर जाने से रोकने के लिए भी कुछ ठोस काम कर ही लिया जाए ? इस सरकार ने कुछ काम तो अच्छे कर ही लिए हैं तो फिर क्या वजह है कि इस मसले पर कुछ हिचक दिखाई दे रही है ?  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें