मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 18 February 2011

नक्सलियों का दुस्साहस

                     उड़ीसा में नक्सलियों ने जिस तरह से मलकानगिरी जिले के जिलाधिकारी आर वी कृष्णा का अपहरण कर लिया है उससे तो यही लगता है कि आने वाले समय में सरकारी स्तर पर की जाने वाली इस लापरवाही से नक्सली कुछ लाभ उठा सकते हैं. माओवादियों के दबाव में आते हुए राज्य सरकार ने मलकानगिरी जिले समेत पूरे राज्य में माओवादियों के खिलाफ़ अपने अभियान को रोकने का आदेश जारी कर दिया है. इस पूरे मसले को देखते हुए यही लगता है कि कहीं न कहीं से सरकारी अधिकारियों द्वारा सुरक्षा के निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है और साथ ही यह भी हो सकता है कि किसी दूर दराज़ के क्षेत्र में कृष्णा स्थिति का जायजा लेने के लिए जा रहे हो और वापसी में किसी निर्जन स्थान पर उनकी सुरक्षा से अधिक लोगों ने आकर उनका अपहरण कर लिया हो ? फ़िलहाल तो एक बड़े और सफल होते अभियान को कहीं न कहीं से रोकने की मजबूरी सरकार के सामने है और इसका सबसे बड़ा प्रभाव पूरे देश में माओवादियों पर पड़ सकता है और वे समय आने पर इस तरह से कहीं पर भी अधिकारियों का अपहरण कर सकते हैं.
                    यह सही है कि कुछ लोगों के बहकावे में आकर लोग माओवादियों के साथ जुड़ जाते हैं और कई बार ऐसा भी होता है कि वे अपने को सही साबित करने के लिए पुलिस की कुछ ज्यादतियों के बारे में बताकर जनता को गुमराह भी किया करते हैं. अब इतने बड़े अभियान को चलाने में कहीं न कहीं से पुलिस से भी कुछ चूक हो जाया करती है जिसका ये लाभ उठा लिया करते हैं. सबसे बड़ी बात जो अब राज्य सरकार को करनी चाहिए कि किसी भी अधिकारी के जाने आने में अधिक सुरक्षा व्यवस्था की जाये और आवश्यकता पड़ने पर इनके चलने फिरने की जानकारी आख़िरी समय तक गुप्त रखी जाये क्योंकि जब तक इस तरह से सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत नहीं किया जायेगा तब तक कोई भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं रह पायेगा. सबसे बड़ी बात जो करनी चाहिए कि किसी भी तरह से देश के सुदूर में बसे गाँवों तक विकास को पहुँचाने का काम तेज़ी से किया जाना चाहिए क्योंकि जब तक विकास की यह आंधी गाँवों तक नहीं पहुंचेगी तब तक कोई भी माओवादियों को दुष्प्रचार करने से नहीं रोक पायेगा. एक बात पर और विचार करने की ज़रुरत है कि कहीं न कहीं से माओवादियों से सार्थक बातचीत की संभावनाओं को भी तलाशा जाना चाहिए.
                         क्या कारण है कि देश के जो भाग प्राक्रतिक संसाधनों से भरपूर हैं वहीँ पर यह समस्या अधिक दिखाई देती है ? शायद इसके पीछे यह बड़ा कारण हो कि जिन संसाधनों पर ये लोग अपना हक़ जताते हैं वहीं पर दूसरे ठेकेदार और बड़ी कम्पनियां आकर लाभ कमाती हैं और स्थानीय निवासी केवल मजदूर बनकर ही रह जाते हैं जिससे उनके लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो जाता है. अब भी समय है कि केवल अभियान चलाकर इस समस्या से निपटने की नीति पर पुनर्विचार किया जाये और कुछ लोगों के सहयोग से इन भटके हुए लोगों से बात भी की जाये. हो सकता है कि आने वाले समय में इस मामले में कुछ प्रगति हो पाए ? फिलहाल राज्य सरकार के पास विकल्प बहुत सीमित ही रह गए हैं क्योंकि ऐसी स्थिति में कोई भी सरकार कुछ खास कर पाने की स्थिति में नहीं होती है. देश में कहीं पर भी होने वाली इस तरह की घटना का विरोध करना ही चाहिए माओवादी अधिकारियों को अपहृत कर यह दिखाना चाहते हैं कि जो व्यक्ति राज्य सरकार का प्रतिनिधि है अगर वे चाहें तो वे उसकी सुरक्षा के बाद भी उसे अगवा कर सकते हैं ? फ़िलहाल किसी अन्य बात पर विचार करने के स्थान पर केवल कृष्णा की सुरक्षित रिहाई की तरफ ध्यान लगाना चाहिए.     
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1 comment:

  1. मेरे विचार में आई-ए-एस की जान भी उतनी ही अमूल्य है जितनी एक आम आदमी की.

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