मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 29 August 2011

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जिस तरह से संप्रग सरकार ने अन्ना हजारे के आन्दोलन से निपटा है उसमें बहुत सारी खामियां दिखाई दी हैं फिर भी कहीं से यह भी नहीं कहा जा सकता है कि सरकार पूरी तरह से अन्ना के फैक्टर से परिचित नहीं थी. देश के संसदीय इतिहास में पहली बार किसी सरकार ने इस तरह से किसी सामाजिक संगठन की मांग पर इस तरह से ध्यान दिया है. आज जब सारा कुछ संपन्न हो चुका है और अन्ना अब देश एक साथ अपनी मांगें मनवाने के बाद खुश हैं उससे तो यही लगता है कि सरकार ने अपनी यह अग्नि परीक्षा पूरी कर ली है. अन्ना के अप्रैल माह के अनशन के बाद जब सरकार ने सिविल सोसायटी से बात शुरू की थी तब भी कई राजनैतिक दलों ने इसे संसद का अपमान बताया था पर मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने यह बात समझ कर ही सोसाइटी से बात का रास्ता खोला था. जब पूरा देश क्रिकेट जैसे घटिया खेल में फंसा हुआ था तो अन्ना भूखे बैठे उनके लिए कुछ पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. मनमोहन पर जिस तरह के आरोप लगाये गए उनकी कोई आवश्यकता नहीं थी पर जब बात बिगड़ने लगती है तो कोई कुछ भी कहने लगता है.
    अन्ना के इस अनशन से देश ने राजनेताओं पर जो बढ़त हासिल की है अब उसे भुनाने के लिए भी सरकार पर दबाव बनाए की आवश्यकता है क्योंकि अगर जनता चुप होकर बैठ जाती है तो एक बार फिर से नेताओं को यह लगने लगेगा कि वे अपनी मनमानी कर सकते हैं. अभी आम चुनावों में बहुत समय है और यह सरकार भी जानती है कि लोकपाल मसले पर किसी भी तरह की चूक से उसे लेने के देने पड़ सकते हैं. जिस तरह से संसद में बहस हुई और देश को नेताओं के बारे में पता चला उसके बाद यह कहा जा सकता है कि जनता ने अपनी पहली लड़ाई जीत ली है फिर भी देश के भाग्य को बदलने वाले इस विधेयक के लिए कुछ घंटों की बहस काफी नहीं है क्योंकि इसमें राजनैतिक दलों के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं को ही बोलने का अवसर मिला था. अब सरकार को स्थायी समिति के पास ससे विधयक के सदन में आने के बाद इस पर विचार करने के लिए कुछ दिनों का एक विशेष सत्र बुलाना चाहिए क्योंकि जिन मुद्दों पर देश नेताओं को सुनना चाहता है वे अभी भी अनछुए से रह गए हैं. सांसदों के मन में इन सब को लेकर क्या चल रहा है इस पर भी चर्चा होनी चाहिए और कौन केवल घटिया राजनीति करना चाहता है यह भी जनता को पता चलना चाहिए. अब वह समय नहीं है कि भ्रष्टाचार को भी जाति, धर्म से जोड़कर देखा जाये क्योंकि कुछ नेताओं को जो भेदभाव दिखाई देता है वह अब केवल उनका नज़रिया है पूरा देश अब लोकपाल विधेयक के पक्ष में है.
   जो भी सरकार सत्ता में होती है उसके पक्ष को भी ध्यान में रखकर ही कोई बात करनी चाहिए क्योंकि बाहर से कुछ भी कहना आसान होता है पर जब सत्ता की चाभी हाथ में हो तो नियम कानून की बातों को भी समझना पड़ता है. सभी मानते हैं कि संसद सर्वोच्च है पर जब सर्वोच्च से सब कुछ नहीं मिल पाता जिसकी आशा की जाती है तो इस तरह के आन्दोलन स्वयं ही जन्म ले लेते हैं. यह समय देश के राजनैतिक तंत्र के लिए आत्म मंथन का है कि अब वे कुछ भी करते हुए कुछ भी नहीं बोल सकते हैं आख़िर क्या कारण है कि कभी नेताओं को आदर्श मानने वाला यह देश उनके इतने ख़िलाफ़ कैसे हो गया ? इस बात का उत्तर तो नेताओं को ही तलाशना होगा क्योंकि जब तक देश के राजनैतिक तंत्र में मूर्छा बनी रहेगी जनता को उसके हक नहीं मिल पायेंगें तब तक उसे संघर्ष करना ही पड़ेगा. सरकार को तुरंत यह घोषणा कर देनी चाहिए कि इस मुद्दे पर व्यापक बहस के लिए एक विशेष सत्र का आयोजन किया जायेगा और उसे समय सीमा में नहीं बाँधा जाना चाहिए क्योंकि जब तक सार्थक और पूर्ण बहस नहीं हो पायेगी तब तक इस विधेयक को अपना सही स्वरुप भी नहीं मिल आयेगा. साथ ही यह भी होना चाहिए कि जो सांसद बिना उचित कारण इस सत्र से अनुपस्थित रहेंगें उनके पूरे वर्ष के वेतन/ भत्ते को नहीं दिया जायेगा और उनको मिलने वाली पेंशन भी आधी कर दी जाएगी. इतने महत्वपूर्ण विधेयक से केवल ऐसे ही अनुपस्थित रहने वालों के नाम भी रोज़ प्रकाशित किये जाएँ जिससे जनता भी जान सके कि उनके सांसद ने आखिर लोकपाल विधेयक पर बहस में कितनी दिलचस्पी दिखाई.

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