मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 11 September 2011

साम्प्रदायिक हिंसा विधेयक

राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक में भी जिस तरह से साम्प्रदायिक हिंसा विधेयक के विरोध में मुखर स्वर सुनाई दिए उससे यही लगता है कि इस विधेयक के कुछ प्रावधान अवश्य ही ऐसे हैं जिनके बारे में देश के बहुत सारे राजनैतिक दलों को बहुत आपत्ति है. यह सही है कि देश ने आज़ादी के समय से ही सांप्रदायिक हिंसा में हमेशा ही बहुत कुछ खोया है जिससे इस बिल की कई बार आवश्यकता भी महसूस की जाती रही है. इस तरह के महत्वपूर्ण विधेयकों पर खुली बहस होनी चाहिए और सरकार को इस तरह के किसी भी विधेयक को संसद में रखने से पहले देश भर की राय जानने की कोशिश भी करनी चाहिए. यह सही है कि कई बार राज्य सरकारें संगठित हमलों के समय निष्पक्ष होकर काम नहीं कर पाती हैं जिससे देश का बहुत बड़ा नुकसान होता है पर इस तरह की प्रशासनिक नाकामियों या संगठित अपराध को आख़िर किस तरह से परिभाषित किया जायेगा ? देश में पहले से ही बहुत सारे स्थानों पर इन्हीं मुद्दों के कारण तनाव की स्थिति बनी रहती है पर कहीं से भी इसे रोकने की ठोस कोशिश होते ही ऐसे अपराध एकदम से बंद हो जाते हैं.
     एक समय बिहार में भी लालू ने यह कहा था कि किसी भी जगह दंगे होने पर वहां के प्रशासनिक अधिकारी ज़िम्मेदार माने जायेंगें तो उस समय इस तरह की घटनाओं पर काफ़ी हद तक लगाम लग गयी थी भाजपा हमेशा से ही इस बात को एक मुद्दे के रूप में रखती रही है किउसके शासन में दंगों की संख्या नगण्य होती है. आख़िर इस तरह से कोई प्रयास करने से ही अगर दंगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है तो फिर मौजूदा कानून के तहत ही इससे क्यों नहीं निपटा जा सकता है ? असल में देश में हर बात का राजनैतिक लाभ उठाने की एक परंपरा सी बन गयी है जिससे देशहित में लिए जाने फ़ैसले भी प्रभावित होते रहते हैं. यह सही है कि आज केंद्र को एक ऐसे सख्त कानून की ज़रुरत है जो राज्य द्वारा निष्पक्ष न रहने पर उसे दख़ल देने का अधिकार देते हों पर एक संघीय ढांचे में कौन इस बात की गारंटी दे सकता है कि आने वाले समय में या आज ही इस कानून का दुरूपयोग केंद्र द्वारा नहीं किया जायेगा ? देश में पहले से ही बहुत सारे कानून मौजूद हैं बस आवश्यकता है तो दृढ़ इच्छाशक्ति की जिसके भरोसे उपद्रवियों के हौसलों को तोड़ा जा सकता है.
  अभी तक साम्प्रदायिकता की कोई स्पष्ट परिभाषा भी नहीं बनायीं जा सकी है किसी को यह स्वाभिमान लगता है तो किसी को यह अपराध ? हर व्यक्ति अपने हित लाभ के अनुसार ही यह फ़ैसले लेता है कि क्या सांप्रदायिक है और क्या नहीं ? कश्मीर घाटी से जिस तरह से संगठित रूप से कश्मीरी पंडितों को निकाला गया वह क्या था ? जब महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय लोगों पर हमले किये जाते हैं तो वह क्या होता है ? जब दंगे भड़कने पर राज्य का प्रशासन सोता है या फिर जानकर अनजान बना रहता है तो वह क्या होता है ? पूर्वोत्तर में अप्रवासी मजदूरों को मार दिया जाता है तो वह क्या होता है ? क्या देश में कानून नहीं है या फिर उसमें दम नहीं है ? देश में अच्छे कानून भी है और उनमें बहुत सारी शक्तियां भी हैं पर हमारे लचर राजनैतिक तंत्र में दम नहीं बचा है क्योंकि उसे हर जगह अपने लाभ ही दिखाई देते हैं. देश के नेताओं को अब यह दिखाना ही होगा कि उनमें काम करने की इच्छा शक्ति है और वे हर परिस्थिति में काम करने के लिए तैयार हैं. संसद में किसी भी नए कानून के बनने से कोई सुधार नहीं होने वाला है क्योंकि जब तक काम करने की नियति नहीं होगी तब तक कोई कुछ नहीं कर सकता है.  

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

5 comments:

  1. सही कहते है आप...
    देश में क़ानून की कमी नहीं उनके परिपालन में लापरवाही या कोताही बरती जाती है...
    उन्हें छोड़कर नए नए क़ानून के लिए होने वाली मशक्कत डायनिंग टेबल पर नए खाद्य पदार्थ सजाने से ज्यादा कुछ प्रतीत नहीं होता...
    नियमों के प्रति नियत साफ़ हो... समस्याएं सुलझाई और उन्मुलित की जा सकती हैं....
    सार्थक आलेख.... बधाई...

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  2. सत्ताधारी दल को साम्रदायिकता ख़त्म करने से मतलब नहीं है ये तो सिर्फ इस नाम से एक कानून बनाकर वोट बैंक बनाना चाहते है |

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  3. रतन जी की बात दुहराता हूं.

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