मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 25 September 2011

यूएन में मनमोहन

संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक सभा में बोलते हुए मनमोहन सिंह ने आतंकवाद से लड़ने पर जोर देते हुए भारत की सुरक्षा चिंताओं से पूरे विश्व को अवगत कराया है उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि आतंकवाद से चयनात्मक तरीके से नहीं वरन पूरी तरह से लड़ाई लड़ी जाये क्योंकि किसी विशेष परिस्थिति में अलग तरह से और अन्य सामान्य परिस्थितियों में अलग तरह से काम करने से विश्व में यह धारणा बनती है कि आतंक का स्वरुप अलग अलग है क्या ?  आतंक को सीमा और धर्म में नहीं बाँधा जा सकता है क्योंकि आज जिस तरह से आतंकियों के मंसूबे पूरे नहीं होने पर वे पूरी दुनिया के विद्रोहियों को साथ लेने में नहीं चूकते हैं और लगभग हर क्षेत्र में इस तरह के तत्वों को बढ़ावा देने का काम किया करते हैं उससे यही लगता है कि आने वाले समय में आतंक का स्वरुप और भी घिनौना होने जा रहा है.
     आज जिस तरह से विश्व में कुछ देश आतंक का पोषण करने में लगे हुए हैं उससे हालात और भी बिगड़ते जा रहे हैं क्योंकि जब कहीं से भी सरकारी मशीनरी भी इस तरह के आतंकियों को पनाह देने लगती है तो इनके हौसले बहुत बढ़ जाया करते हैं. इस्लाम के नाम पर कुछ देश इस तरह से आतंक को पोषित करने में लगे हुए हैं जैसे उनके इस काम के बिना इस्लाम पर बहुत बड़ा संकट आने वाला है जबकि वास्तविकता यह है कि इन कुछ लोगों की इस तरह की हरकतों के कारण ही आज पूरे विश्व में इस्लाम के अनुयायियों को शंका की दृष्टि से देखा जाने लगा है ? २६/११ के बाद जिस तरह से पश्चिमी देशों ने अपने यहाँ मुसलमानों के आवागमन पर इतनी नज़र रखनी शुरू कर दी है कि आज अपने व्यवसाय या अन्य कारणों से विश्व भर में यात्रा करने वाले मुसलमानों के लिए पहचान ही बड़ा संकट बनती जा रही है.
   आतंक से लड़ने में जिस तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों का जो रवैया रहा करता ही वह ही पूरे विश्व के लिए बहुत ख़तरनाक होने वाला है अब इन देशों को आतंकवाद को अपने हितों से जोड़कर उसके हिसाब से काम करने वाली नीति से आतंक का अपरोक्ष रूप से पोषण ही किया जा रहा है जिसका फल अमेरिका भुगत भी चुका है फिर भी अभी तक उसने अपनी नीति में कोई सामरिक बदलाव नहीं किया है ओसामा को अमेरिका में घुसकर मारने और केवल आतंक के बारे में बातें करने में बहुत बड़ा अंतर है और आज अमेरिका को सुरक्षित दुनिया के लिए इस तरह के दोहरे चरित्र का त्याग करना ही होगा क्योंकि इसके बिना अब पूरी दुनिया में आतंक के ख़िलाफ़ कोई भी लड़ाई सफलता पूर्वक नहीं लड़ी जा सकती है.  

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