मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 14 November 2011

ब्राह्मण का शंख और लखनऊ की दूरी

   लगता है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाह में एक बार फिर से मायावती अपने जातिवादी कार्ड को खेलने की पूरी कोशिश करने वाली हैं जिससे आने वाले समय में प्रदेश में एक विशेष प्रकार की प्रायोजित सामाजिक समरसता भी नज़र आने वाली है. पिछले चुनावों में अन्य पार्टियों के जाति आधारित नेता लोग इस बात का अंदाज़ा ही नहीं लगा पाए कि इस तरह से भी समाज को जोड़ा जा सकता है और इसका बहुत बड़ा लाभ बसपा ने पिछले चुनावों में उठा भी लिया पर इस बार इस तरह के (मनुवादी) ब्राह्मणों के सम्मलेन से अपने चुनावी अभियान को शुरू करने वाली बसपा के लिए आने वाले समय में बहुत बड़ी मुश्किलें खड़ी होने वाली हैं जिससे इस बार इन जाति आधारित सम्मेलनों का कोई बहुत व्यापक असर सामने आ पायेगा इस बात पर भी संदेह है. पिछली बार और इस बार के इन सम्मेलनों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि पहले जहाँ वास्तव में अन्य दलों से परेशान ब्राह्मण स्वयं ही इन सम्मेलनों की तरफ़ गया था वहीं इस बार सत्ता की चमक का लाभ उठाकर अपने प्रभाव का विस्तार करने वाले कुछ नेताओं के दबाव में इस बार यह भीड़ अधिक बढ़ गयी है जिसके वोट में बदलने को लेकर सभी के मन में संदेह है.
   चुनाव में भीड़ तंत्र का लाभ केवल जनसभाओं तक ही होता है और जब विकल्प हीनता की स्थिति हो तब भीड़ तंत्र अच्छा काम कर भी जाता है पर जब यह स्वतः स्फूर्त के स्थान पर प्रायोजित हो जाता है तो इसकी स्वीकार्यता और प्रभाव दोनों ही घट जाया करते हैं. यह सही है कि इस सरकार ने बनने से पहले बहुत कुछ करने की लम्बी चौड़ी बातें की थीं पर जब उन्हें धरातल पर उतारने की बात आई तो शायद सरकार यह भूल गयी कि जनता की कुछ समस्याएं अभी भी और हमेशा ही न पूरी होने वली होती हैं जिनके बारे में पूरी दृढ़ता से काम करने की ज़रुरत होती है और उत्तर प्रदेश में जितना कुछ बिगड़ा हुआ है उसे सुधारने के लिए किसी भी सरकार को कम से कम दो कार्यकाल अवश्य चाहिए हैं जबकि वर्तमान परिस्थितियों में इस सरकार के वापस लौटने पर सिर्फ़ इसीलिए प्रश्नचिह्न लगा हुआ है कि इसने योजनाओं के बारे में कुछ ठोस नहीं किया. सबसे बड़ी बात जो इस सरकार को लोगों से दूर कर गयी वह यह भी थी कि लोगों की आकांक्षाएं इस सरकार से बहुत अधिक थीं और उनके सभी के पूरा होने की संभावनाएं भी नहीं थीं पर लोगों को यह भी तो नहीं लगा कि यह सरकार कहीं से भी वास्तव में प्रदेश को कुछ अलग ढंग से चलने की मंशा भी रखती है.
    जैसा कि हमेशा ही होता चला आया है कि सत्ताधारी दल की चुनावी तैयारियां तो बहुत मज़बूत दिखती हैं पर जब वोट डालने की बात आती है तो इस भीड़ पर लोगों के मन में छिपे मुद्दे हावी हो जाते हैं इस बार बसपा के ब्राह्मण नेताओं ने भीड़ जुटाकर अपनी पहली परीक्षा को तो पास कर लिया है पर क्या ये भीड़ इस बार भी पिछले चुनावों की तरह वोट में बदल पायेगी इस बात पर खुद इन नेताओं को भी भरोसा नहीं है. इस पूरे प्रकरण में बसपा के कुछ ब्राह्मण विधायक तो सदन तक पहुँच सकते हैं पर पूरे प्रदेश में किस हद तक वे वोटों को बसपा के हक़ में डलवा पाते हैं यह तो समय ही बताएगा क्योंकि आम मतदाता जिनमें ब्राह्मण भी शामिल है इस सरकार से खुश नहीं हैं जिसका असर चुनावों में साफ़ दिखाई देने वाला है. स्थानीय मुद्दों पर प्रदेश की राजनीति कितनी हावी होने वाली हैं यह इस चुनाव से ही स्पष्ट हो जाने वाला है. मंहगाई किसी भी सरकार के नियंत्रण में नहीं रह सकती है पर बेहतर शासन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का काम तो सरकारें कर ही सकती हैं पर प्रदेश में जिस तरह से जनता कुशासन से तंग है यह बाहर वालों को नहीं पता चल पा रहा है और २००७/ २००९ के बाद अब बहुत समय बीत चुका है जिसका असर भी पूरे प्रदेश पर पड़ने वाला है. इस पूरे प्रकरण में सबसे ख़राब हालत बसपा के ब्राह्मण नेताओं की ही होने वाली है क्योंकि अगर भीड़ वोटों में नहीं बदली तो मायावती किस तरह से निपटती हैं यह सभी को पता है.            


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