मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 31 मार्च 2012

माओवादी और सरकार

       ओडिशा में जारी बंधक संकट से निपटने में एक बार फिर से सरकार की लापरवाही सबके सामने आ रही है क्योंकि इस तरह के मसलों को जिस तरह से निपटा जाना चाहिए वह कर्तव्यनिष्ठा और तत्परता अभी तक दिखाई नहीं दे रही है. माओवादियों ने सरकार के किसी मध्यस्थ या किसी अन्य पर विश्वास करने के स्थान पर पत्रकारों पर अधिक विश्वास जताकर या साबित भी कर दिया है कि सरकार उनसे बात करते समय जो कुछ कहती है वह उस पर टिकती नहीं है जिससे हर बार बातचीत विफल होने का अंदेशा बना रहता है. एक इतालवी बंधक को छोड़कर उन्होंने इस बाट के संकेत भी दे दिए हैं कि वे अपनी मांगें मान लेने पर सभी को सुरक्षित छोड़ देंगें. आने वाले समय में इस तरह की घटनाएँ तब भी अधिक होती हैं जब लोकतंत्र में भरोसा जताने वाली कोई भी पार्टी अचानक ही इन अलगाववादियों से गुप्त वार्ताएं शुरू कर उनका चुनाव में इस्तेमाल करती हैं और बाद में विधि सम्मत न होने के कारण इनकी मांगों पर कोई निर्णय नहीं ले पाती हैं जिसका सीधा असर इस तरह के बंधक प्रकरणों से सामने आता दिखाई देता है ? देश में इस तरह की गतिविधियों में अचानक ही जिस तरह से वृद्धि हुई है उससे यही लगता है कि माओवादी किसी रणनीति के तहत काम करने में लगे हुए हैं और इसका असर पूरे देश की माओवादियों से प्रभावित पूरे क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है. 
       सबसे पहले इस समस्या के कारणों पर गंभीर विचार की आवश्यकता है क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि ये केवल अलगाववाद के लिए ही आन्दोलन रत हैं ? देश में जिस तरह से आदिवासी क्षेत्रों में वहां के मूल निवासियों को आज तक वो सुविधाएँ नहीं मिल सकी हैं जिनके वे हक़दार हैं और साथ ही बढ़ते हुए औद्योगिकीकरण से भी मामला और बिगड़ रहा है क्योंकि जब कोई बड़ी परियोजना लगाने की बात होती है तब तो कुछ और कहा जाता है पर बाद में सरकार या सम्बंधित परियोजना से जुड़े हुए लोग इन आदिवासियों की समस्याओं पर बिलकुल भी ध्यान नहीं देते हैं जिसका सीधा असर इनके विकास पर पड़ता है. किसी बड़ी परियोजना के इनके स्थान पर आने से जो लाभ इन्हें मिलने चाहिए वे कभी भी नहीं मिलते हैं और उलटे उन पर कई तरह के प्रतिबन्ध भी लागू हो जाते हैं जिससे इनके मन मेंं जो आक्रोश पनपता है माओवादी उसका लाभ उठाने का प्रयास करते रहते हैं ? यह ठीक उसी तरह से होता है कि हताशा और क्रोध में लोग हथियार उठाने के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं जो किसी भी तरह से उनके या क्षेत्र के लिए ठीक नहीं होता है पर इस बात के लिए केवल किसी एक सरकार या इन अलगाववादियों को ही ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता है क्योंकि यह उदासीनता की पराकाष्ठा से उपजे हुए घाव हैं जिन्हें भरने के लिए बहुत समय चाहिए.
     अब सभी को एक बात समझनी ही होगी कि इस तरह की दोहरी नीतियां इस समस्या को आगे बढ़ाने का ही काम करेगी क्योंकि जब तक इस समस्या के कारणों पर ठीक ढंग से विचार नहीं किया जायेगा तब तक इससे पूरी तरह से निपटा नहीं जा सकता है ? आज अगर हमारे बीच के ही हमारे नागरिक केवल विकास और भेदभाव को ही केंद्र में रखकर इस तरह से हथियार उठाने को मजबूर हो रहे हैं तो उससे यही समझ जा सकता है कि कहीं न कहीं हमारा तंत्र वह सब नहीं कर पा रहा है जिसकी उससे आशा की जाती है ? सरकार को खुले तौर पर विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए पर आज माओवादियों में भी कुछ लोग भी ऐसे आ चुके हैं जो केवल सशस्त्र संघर्ष की भाषा ही बोलना पसंद करते हैं जिससे इन पिछड़े इलाकों में आज विकास की गति चाहकर भी तेज़ नहीं हो पा रही है क्योंकि ये सभी जानते हैं कि अगर सरकार की सही पहुँच इन इलाकों तक हो गयी तो माओवादियों को मिलने वाला जन समर्थन ख़ुद ही कम होने लगेगा. अब सरकार को इन खास जिलों पर ध्यान केन्द्रित करके बलपूर्वक विकास कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर करवाने के प्रयास करने चाहिए जिससे विकास की गति कुछ इलाकों तक पहुँच सके और बचे हुए क्षेत्र भी इस बात को देखकर अपने यहाँ विकास की बाट जोहना शुरू करें और विकास से चिढ़ने वाले माओवादियों को नैतिक समर्थन देना कम या बंद कर दें ? 
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