मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 9 June 2012

आईआईटी और सरकार

      आईआईटी में प्रवेश परीक्षा के स्वरुप को लेकर चल रहे मंथन में कानपुर आईआईटी ने एक नयी राह पकड़ते हुए अपने संस्थान में २०१३ की प्रवेश परीक्षा जेईई के माध्यम से कराने के स्थान पर अपने स्तर से परीक्षा को संचालित करने को मंज़ूरी दे दी है जिससे केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की उस व्यवस्था में बदलाव की कोशिश को बहुत बड़ा झटका लगा है जिसमें उसने कक्षा 12 में पाए गए अंकों को भी प्रवेश परीक्षा में कुछ भाग देने के लिए कोशिश करनी शुरू की थी. जिस तरह से आईआईटी अपने आप में स्वतंत्र रूप से संचालित होने वाली संस्था है उस स्थिति में सरकार के पास वर्तमान कानून में उसकी इस योजना को रोक पाने का कोई रास्ता नहीं है. कानपुर ने इस विवाद को आगे बढ़ाते हुए जहाँ अपनी अलग प्रवेश परीक्षा की बात की है वहीं साथ ही यह भी कह कर अपनी बात को आगे बढ़ने का काम भी किया है कि अन्य आईआईटी अगर चाहें तो उसकी इस प्रवेश परीक्षा में शामिल हो सकते हैं इससे केन्द्रीय बोर्ड द्वारा करायी जाने वाली परीक्षा को कितनी मान्यता मिल पायेगी यह भी सोचने का विषय है.
       देश के सर्वोच्च प्रौद्योगिकी संस्थानों में आख़िर ऐसा क्या चल रहा है जिससे वे इस तरह टकराव के रास्ते पर चलने को मजबूर हो रहे हैं और आख़िर मानव संसाधन मंत्रालय के पास भी ऐसी क्या योजना है जिस पर अमल करने में इन संस्थानों को इतनी दिक्कतें होने वाली हैं ? देखा जाये तो दोनों ही अपनी अपनी जगह पर कुछ हद तक सही हैं पर अभी तक इस बदलाव के लिए कोई ऐसा सर्वमान्य हल भी नहीं निकल पाया है जिसके माध्यम से देश की सही प्रतिभा को सामने लाया जा सके और केवल रट कर या किसी विशेष तरीके से पेपर हल करने वाली प्रथा से भी मुक्ति पाई जा सके क्योंकि इससे वास्तविक मेधा आगे नहीं आ पाती है और केवल प्रवेश परीक्षा के अनुसार तैयारियां करने के कारण बच्चों का उस तरह से विकास भी नहीं हो पाता है. कुछ समय पहले इस बात पर सभी को चिंतित देखा गया है कि इन संस्थानों से जिस तरह की मेधा सामने आनी चाहिए और जितने बड़े स्तर पर विज्ञान में शोध होने चाहिए वे नहीं हो रहे हैं जिससे लगता है कि केवल किसी तरह से इन संस्थानों में प्रवेश लेकर अच्छी नौकरी करना ही आज एक उद्देश्य रह गया है ?
       देश में आज की जरूरतों के अनुसार शिक्षा क्षेत्र में सुधारों की बहुत आवश्यकता है पर इन सुधारों को क्या इस तरह से हड़बड़ी में लागू किया जा सकता है ? क्या कोई ऐसे सरल प्रक्रिया सामने लायी जा सकती है जो किसी भी तरह से देश की सही प्रतिभा को विज्ञान और शोध के क्षेत्र में आगे लाने का काम कर सके ? पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से केवल आईआईटी में प्रवेश पाने के लिए जिस तरह के हथकंडों को कोचिंग वाले मोटी फीस लेकर अपनाने लगे हैं उससे सही मेधा के पास यहाँ तक पहुँचने के रास्ते कम अवश्य हो गए हैं फिर भी इस व्यवस्था को सुधारने के लिए सभी मिलकर कोई प्रयास क्यों नहीं करना चाह रहे हैं ? कपिल सिब्बल के प्रयास अच्छे हैं पर जब इतने बड़े स्तर पर बदलाव की बातें की जाती हैं तो उस स्थिति में यह सब अचानक ही नहीं हो जाया करता है इसलिए सिब्बल को इसके लिए हड़बड़ी करने के स्थान पर विचार विमर्श की एक श्रंखला चलानी चाहिए जिससे इस बदलाव के बाद होने वाले परिणामों पर भी चर्चा की जा सके. साथ ही इन संस्थानों को भी परिवर्तन के लिए खुद को तैयार करना ही होगा क्योंकि जो कुछ सिब्बल का कहना है वह पूरी तरह से गलत भी नहीं है पर उसके लिए पहले देश भर में १२वीं में एक सामान पाठ्यक्रम और मूल्यांकन की व्यवस्था करने की ज़रुरत है सिब्बल को भी इन संस्थानों की समस्याओं को हल करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि कुछ अच्छा करने में काफी मेहनत करनी पड़ती है और अब इसके लिए देश को तैयार होना ही होगा इसे किसी व्यक्ति या संस्थान की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखने के स्थान पर देश के प्रतिष्ठा के साथ जोड़कर देखने की आदत हम सभी को अब डालनी ही होगी.   
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