मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 1 July 2012

"टर्निंग पॉइंट्स" के सच

             पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम की पुस्तक "टर्निंग पॉइंट्स" लगता है भाजपा के लिए कोई बड़ा टर्न लेकर ही आने वाली है क्योंकि अभी तक डॉ कलाम के कार्यकाल के समय की बातों को भाजपा और उसके नेता जिस तरह से प्रस्तुत किया करते थे उससे यही लगता था जैसे डॉ कलाम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पसंद नहीं करते थे ? पर अब जब पुस्तक के कुछ अंश सामने आ रहे हैं तो भाजपा के लिए अपना चेहरा बचाना मुश्किल हो रहा है और ऐसी स्थिति में भी वह सच को स्वीकार करने के स्थान पर नए नए तर्क गढ़ने में लगी हुई है. जिस तरह से पुस्तक में कहा गया है कि २००४ में सोनिया की तरफ से पत्र मिलने के बाद डॉ कलाम के पास उन्हें पीएम बनाने के अलावा और कोई चारा नहीं था और उस समय राष्ट्रपति भवन में उन्हें आमंत्रित करने के लिए पत्र भी तैयार कर लिए गए थे पर जिस तरह से सोनिया ने खुद को इस पद के लिए न प्रस्तुत करते हुए डॉ मनमोहन सिंह को आगे किया उससे खुद डॉ कलाम भी हैरान हुए बिना नहीं रह सके ? संवैधानिक तौर पर सोनिया को उस समय पीएम पद पर जाने से कोई रोक नहीं सकता था और उनके पास आवश्यक बहुमत भी था जिसे वे राष्ट्रपति को लिखित रूप से प्रस्तुत भी कर चुकी थीं. असल में भाजपा ने उस समय जो भी दबाव बनाने की कोशिश की उससे उसे लगता था कि कोई सफलता भले ही न मिले पर वो विदेशी मूल का मुद्दा एक बार फिर से गर्माना चाहती थी ? पर जब देश के पूरे राजनैतिक तंत्र ने सोनिया के लिए आवश्यक बहुमत के लिए अपना समर्थन कर दिया था तो इस तरह की बातों का कोई मतलब भी नहीं था पर अपने करिश्माई नेता अटल के नेतृत्व की एक विदेशी मूल की महिला के हाथों इस तरह हुई पराजय को भाजपा भुला नहीं पा रही थी क्योंकि उसे अपने उस कृत्रिम फील गुड पर पूरा भरोसा था ?
       अब जब डॉ कलाम के गुजरात दौरे के बारे में भी कुछ सामने आना शुरू हो गया है तो भाजपा के लिए अपनी स्थिति को संभालना और भी मुश्किल होने वाला है क्योंकि जिस तरह से मोदी के नाम को लेकर भाजपा और राजग में मतभेद सामने आ रहे हैं उसके बाद अब यह प्रकरण भी चर्चा में आने वाला है और अपने लाभ के लिए भाजपा भी इसे पूरी हवा देने की कोशिश करने वाली है क्योंकि वह देश की जनता में मोदी को लेकर उनकी छवि की सौदेबाज़ी पूरे देश में करना चाहती है जबकि अभी उन्हें पहले गुजरात में अपने लोगों से ही विधान सभा चुनावों में अधिक लड़ना पड़ सकता है ? भाजपा की कथनी और करनी का अंतर यही पर स्पष्ट हो जाता है क्योंकि जिस तरह से उसने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ कलाम के बारे में जो कुछ भी कहा वह अब कहीं से भी सत्य नहीं दिखा रहा है. डॉ कलाम के गुजरात दौरे को लेकर खुद अटल ने भी उनसे वहां की यात्रा न करने की सलाह दी थी और राजनैतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी उन्हें यही सलाह दिलवाई जा रही थी जिससे भाजपा और अटल को असहज स्थिति का सामना न करना पड़े ? फिर भी डॉ कलाम ने अपनी संवैधानिक कर्त्तव्य का पालन करते हुए गुजरात का दौरा किया था और उनके उस दौरे के बाद राहत और पुनर्वास के काम में काफी तेज़ी भी आई थी.
        यह अच्छा ही हुआ कि डॉ कलाम ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने में अनिच्छा जताई वरना इस तरह की कड़वी सच्चाई जनता के सामने आ जाने के बाद भाजपा अंतरात्मा की आवाज़ पर उनके साथ किस तरह से राजनैतिक दांव खेलती यह सभी को पता है. इस समय इस किताब से जहाँ भाजपा की असलियत सबके सामने आ रही है वहीं भारतीय राजनीति में आने वाले समय में इस किताब का कितना असर होने वाला है यह भविष्य के गर्भ में है फिर भी जब यह किताब पूरी तरह से बाज़ार में आ जाएगी तो काफी लोगों के चेहरों से नकाब उतरने की संभावनाएं बढ़ जायेंगीं क्योंकि अभी तक डॉ कलाम ने किसी भी बात का समर्थन या खंडन नहीं किया था जिसे भाजपा ने अपनी मजबूती समझ लिया था पर अब जब ये सारी बातें सिलसिलेवार तरीके से सबके सामने आने वाली हैं तो इससे भाजपा आख़िर किस तरह से अपना पीछा छुड़ा पायेगी ? राजनीति में शुचिता का आज के समय में कोई स्थान नहीं रह गया है फिर भी कुछ लोग इसे भी आज भी मानते हैं और नैतिक मूल्यों की वक़ालत करते हैं. देश की राजनीति में संस्कृति और सभ्यता की लम्बी लम्बी बातें करने वाली भाजपा आख़िर किन मूल्यों को अपना आदर्श मान रही है यह अब सबके सामने है. अगर देश के वर्तमान स्वरुप को बचाए रखने के लिए नितीश मोदी का खुला विरोध करने की हिम्मत दिखा पाते हैं तो यही असली में भारतीय मूल्य और परम्पराएँ हैं. लोकतंत्र में कोई भी किसी भी स्थान तक पहुंचा सकता है फिर भी मोदी के लिए ७ रेस कोर्स तक की दौड़ उतनी आसान नहीं रहने वाली है जितनी वे और उनके समर्थक सोचते हैं.              
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