मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 20 July 2012

गुडगाँव की कड़वाहट

              लगता है कि उत्तर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्र गुडगाँव का भी अब वही हाल होने वाला है जैसा कानपुर के साथ हुआ था क्योंकि जिस तरह से विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में पिछले दो वर्षों में कई बार हड़ताल और उत्पदान ठप करने का काम श्रमिकों द्वारा किया गया है उसके बाद यहाँ पर स्थिति सभी औद्योगिक घराने अपने कारोबार को राज्य से दूर करने पर विचार करने लगे हैं. ताज़ा घटना में जिस तरह से मारुति उद्योग लिमिटेड के मानेसर स्थित संयंत्र में आग लगाने की घटना हुई उसके बाद किसी को भी यह नहीं पता है कि गुडगाँव और हरियाणा पर छाये यह संकट के बादल आख़िर कब तक छटेंगें ? आज जिस तरह से पूरे देश और खासकर गुजरात में औद्योगिक घरानों के लिए अनुकूल माहौल बना हुआ है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में इस तरह की औद्योगिक इकाइयाँ अगर पूरी तरह से वहां शिफ्ट हो सकती हैं तो कुछ भी ग़लत नहीं होगा पर इस तरह की इकाइयों में काम करने वाले श्रमिकों पर क्या गुजरेगी जब उनके पास करने के लिए काम ही नहीं रह जायेगा या फिर उन्हें दूसरी जगह काम करने का विकल्प दिया जायेगा.
           जिस तरह से मानेसर में जो कुछ भी हुआ और एच आर महाप्रबंधक अवनीश देव को जिंदा ही जलाकर मार डाला गया उसका किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता है क्योंकि किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए इस तरह की हिंसा को किसी भी स्तर पर सही नहीं कहा जा सकता है और जिस तरह से श्रमिकों ने अराजकता फैलाकर अन्य १०० लोगों को भी ज़ख्मी किया उसका भी क्या हिसाब किया जा सकता है ? बड़े औद्योगिक संयंत्रों में कई बार किसी मुद्दे पर विवाद हो सकते हैं पर जिस इकाई से श्रमिकों की रोज़ी रोटी चल रही हो उसमें इस तरह की आगज़नी आख़िर किसके हित में जा सकती है ? यदि इस पूरे प्रकरण से सीख लेते हुए सुजुकी खुद के लिए देश में ही कोई नयी जगह तलाश कर ले और अपने मुख्य उत्पादन को गुडगाँव से वहां शिफ्ट कर दे तो ये श्रमिक उसका क्या बिगड़ लेंगें उलटे उनको ही नयी नौकरी तलाश करनी पड़ेगी. इस तरह के मसलो को स्थानीय मुद्दों के साथ औद्योगिक आवश्यकताओं के हित में में भी समझने की आवश्यकता है क्योंकि किसी भी घराने के लिए भी इतने बड़े प्लांट को पूरी तरह से बंद करना भी आसान फैसला नहीं होता है जिससे पूरे औद्योगिक माहौल में ही कड़वाहट घुल जाती है.
     इस मसले को हरियाणा और केंद्र सरकार को भी हलके में नहीं लेना चाहिए क्योंकि जब इस तरह की हिंसक गतिविधियों से कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है तो इनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए. देश की जिस बेहतर छवि के भरोसे वैश्विक कम्पनियां यहाँ पर अपने इकाइयाँ लगाने की कोशिश करती हैं इससे उन प्रयासों को झटका लग सकता है. साथ ही सरकार को श्रमिकों और प्रबंधन के बीच होने वाले किसी भी विवाद को सम्मान जनक तरीके से सुलाझवाने के ठोस प्रयास भी करने चाहिए क्योंकि श्रमिक हर बार ही ग़लत हों ऐसा भी नहीं हो सकता है ऐसे में सरकार के सक्रिय और ठोस क़दमों से ही देश के औद्योगिक घरानों के विश्वास को बनाये रखा जा सकता है. किसी भी विवाद में सरकार के सुलह कराने में आगे आने से जहाँ श्रमिकों में विश्वास जागेगा वहीं दूसरी तरफ़ इन इकाइयों के प्रबंधकों के लिए भी काम करना आसन हो जायेगा. फिलहाल इस समस्या का समाधान जल्दी ही किकालना चाहिए क्योंकि अब सुजुकी के पास गुजरात में एक अच्छा विकल्प खुल चुका है जो कि उसकी प्राथमिकता में केवल विदेशों की मांग को पूरा करने के लिए था पर गुडगाँव में इस तरह का माहौल कहीं सुजुकी को अपने मुख्य कारोबार को ही गुजरात शिफ्ट करने को मजबूर न कर दे.    
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