मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 30 September 2012

देश की आर्थिक नीति

              देश में आर्थिक सुधारों के जनक और आज के पीएम मनमोहन सिंह के अनुसार देश के लिए जो आर्थिक नीतियां बनाये जाने की आवश्यकता है उन्हें बनाने में वे कभी भी पीछे नहीं हटने वाले हैं भले ही उसके लिए सरकार को कुर्बानी ही क्यों न देनी पड़े. विपक्ष का यह आरोप है कि मनमोहन सरकार विदेशी सरकारों और उपभोक्ता कम्पनियों के दबाव में आकर इस तरह के काम करने में लगी हुई है जससे देश का दीर्घकालिक नुकसान होने वाला है. देश के लिए कौन सही है और कौन ग़लत अब यह किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है ऐसे में आख़िर इस बात का निर्धारण कैसे हो कि देश को भविष्य के लिए किन नीतियों का पालन करना चाहिए. ऐसा नहीं है कि देश में आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों की कोई कमी है पर विभिन्न राजनैतिक कारणों से भी इन विशषज्ञों को अपनी पहले से सोची गयी नीति ही ठीक लगती है जिससे वे उसमें किसी भी तरह के बदलाव के बारे में सोचना भी नहीं चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि एक बार जो नीतियां कारगर रही हैं वे हमेशा ही इस तेज़ी से बदलती हुई विश्व अर्थव्यवस्था में कारगर होती रहेंगीं फिर भी हमारे यहाँ के नेताओं और विशेषज्ञों का अपनी नीतियों से चिपके रहने में पता नहीं क्या सुख मिलता है. भारतीय मेधा ने पूरे विश्व में अपनी प्रातिभा का लोहा मनवाया है ऐसे में आर्थिक स्तर पर हम अपने विशेषज्ञों को सामने लाने का काम आख़िर क्यों नहीं करना चाहते हैं ?
        देश के लिए सभी नेताओं की सोच एक जैसी ही हो चुकी है आज विखंडित जनादेश और गठबंधन की मजबूरियों के कारण जिस तरह से केंद्र सरकारों पर दबाव बना रहता है और वे खुलकर किसी भी नीति को लागू कर पाने में सफल नहीं हो पाती हैं उसके कारण से भी कई बार नीतियों के निर्धारण और क्रियान्वयन में शिथिलता आ जाती है. आज जब पूरे विश्व में हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है तो आख़िर हम कैसे उस माहौल को अपनाये बगैर आगे बढ़ने की सोच सकते हैं ? क्या कारण है कि हर कोई अपने दल के बारे में ही सोचना चाहता है किसी भी राजनैतिक दल या नेता के पास भी इतना समय नहीं है कि वे आपसी मतभेदों को देशहित में भुलाकर आगे बढ़ने के रास्ते पर चलने के बारे में विचार कर सकें ? अगर ऐसा ही है तो फिर इस बात का निर्धारण कैसे हो कि देश के लिए कौन सी नीति ठीक है कौन सी नहीं क्योंकि जिस स्थान पर नीतियों का निर्धारण करने के लिए जनता नेताओं को भेजती है वहां पर अराजकता हावी हो चुकी है और ऐसी परिस्थिति में किसी भी तरह के नीति निर्धारक मसले पर बात हो पाना ही बहुत मुश्किल है.
     ऐसा भी नहीं है कि आज की परिस्थितियों के अनुसार देश के पास कोई विकल्प ही शेष नहीं बचे हैं देश की बदलती हुई आवश्यकताओं के अनुसार हमें खुद ही अपने देश की नीतियों को कुछ इस से प्रगतिशीलता के पथ पर चलाना होगा जिससे हमारे लोगों के हित भी सुरक्षित रहें और विदेशों के साथ हमारे सम्बन्ध भी अच्छे रहें क्योंकि आज के समय में रिश्तों की परिभाषा आर्थिक हितलाभ से जुड़ चुकी है ? हमारे देश के लोगों के हितों का एक हद तक कानूनी संरक्षण करने के बाद विश्व में चलने वाली आर्थिक गतिविधियों को यहाँ भी लाने का अवसर दिया जाना चाहिए साथ ही विदेशी कम्पनियों को जिन शर्तों के साथ काम करने की छूट दी जा रही है उस पर भी निगरानी और नियंत्रण के लिए सरकार अपने प्रयासों को जारी रखने का प्रयास करना चाहिए. देश में उपभोक्ताओं का बहुत बड़ा समूह है अगर खुदरा क्षेत्र को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार काम करने की छूट दी जाती है तो इससे देश में ही प्रतिस्पर्धा का युग शुरू हो सकता है और आम नागरिक की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो सकता है पर यह सब करने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की ज़रुरत पड़ेगी जिसके लिए अभी भी देश में शंकाए हावी रहती हैं ? अच्छा हो कि इस मसले पर समय रहते हम अपनी शर्तों पर काम करते हुए नीतियों का निर्धारण कर लें वरना हो सकता है कि आने वाले समय में मजबूरी में हम इन्हें किसी दूसरे की शर्तों पर काम करने के लिए बाध्य किये जाएँ....        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment