मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 14 November 2012

श्रीलंका और यूएन

                        श्रीलंका में २६ वर्षों तक चले गृह युद्ध की समाप्ति के बाद जिस तरह से अब वहां पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल उठाये जा रहे हैं उनका आज की तारीख़ में कोई औचित्य नहीं है क्योंकि अब जब श्रीलंका अपने पुनर्निर्माण की तरफ बढ़ रहा है तो इस तरह की केवल रिपोर्टों पर आधारित किसी भी बात को लेकर किसी भी संस्था पर सवाल उठाये जाने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है. इस पूरे गृह युद्ध ने जिस तरह से भारत की घरेलू राजनीति पर भी प्रभाव डाला और श्रीलंका की परिस्थितियों को शांत करने के प्रयास में भारत ने पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी समेत कई नेताओं को खोया इससे भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रह सका ? आज भी श्रीलंका की तमिल समर्थक पार्टियाँ श्रीलंका के सिंहलियों का अनावश्यक विरोध करती रहती है क्योंकि इससे उन्हें भी कुछ वोट मिल जाया करते हैं. आज जब श्रीलंका को पुनर्निर्माण और पुनर्वास के लिए धन की आवश्यकता है तो पश्चिमी देशों के प्रभाव में जीने वाले यूएन से यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह निष्पक्ष होकर कुछ कर पायेगा क्योंकि अमेरिका और अन्य विकसित देशों के लिए दुनिया में केवल तेल ही महत्वपूर्ण है और दुर्भाग्य से श्रीलंका के पास यह नहीं है तो ये देश वहां जाकर क्या करते ?
              दुनिया के किसी भी देश में मानवाधिकारों की पैरवी करे वाले लोग यह भूल जाते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार मानवाधिकारों को परिभाषित करने से दुनिया में पहले से ही बहुत सारी समस्याएं उत्पन्न हो चुकी हैं और आज भी ये देश अपने प्रभाव का इस्तेमाल केवल वहीं पर करना चाहते हैं जहाँ से इन्हें कुछ आर्थिक लाभ भी हो तो फिर दुनिया में यूएन की ज़रुरत ही क्या है क्योंकि जब उसे आर्थिक सहायता देने वाले देशों के अनुसार ही सब कुछ चलना है तो इस तरह के मुखौटे की दुनिया को क्या ज़रुरत है ? देश चाहे जो भी हो वहां पर रहने वाले इंसानों के अधिकारों की परिभाषा भी केवल इसी आधार पर तय की जाती है कि वे अमेरिका के हितों का कहन तक पोषण कर सकते हैं ? यह सही है कि आज के समय में हर देश अपने आर्थिक हितों को भी साथ ही रखता है पर क्या आर्थिक हित इतने प्रभावी होने चाहिए कि उनके आगे मानवीय मूल्यों की कोई बिसात ही न रह जाये ? श्रीलंका और अन्य घरेलू विद्रोह झेल रहे देशों को यह अच्छे से पता है कि इस तरह के छद्म युद्धों का पूरे देश पर क्या प्रभाव पड़ता है फिर भी समस्याग्रस्त देशों की मदद करने के स्थान पर उनकी नीतियों को बिना सोचे समझे ही कटघरे में लाना किस तरह से उचित कहा जा सकता है ?
            देश तभी सफल हुआ करते हैं जब उनकी नीतियों को नागरिकों की ज़रूरतों के अनुसार चलाया जाता है पर आज जाति, धर्म, नस्ल और न जाने किन किन बातों पर कुछ देश दूसरे देशों में दख़ल दिया करते हैं जबकि इस मामले में एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता होना चाहिए और उसका किसी भी परिस्थिति में उल्लंघन भी नहीं होना चाहिए. बड़े राष्ट्रों ने जब यूएन को बनाया तब उन्होंने केवल अपने संसाधनों को एक दूसरे के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने से बचने और सीधी लड़ाई को रोकने के पर ही मुख्य रूप से अपना ध्यान केन्द्रित रखा जबकि आवश्यकता यह थी कि किसी भी देश में इस तरह की कोई समस्या होने पर यूएन के पास इतने अधिकार होने चहिये थे कि वह ख़ुद ही सही ग़लत का फ़ैसला कर सके और आम नागरिकों के हितों की रक्षा कर सके. आज भी यूएन अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा है जबकि दुनिया के सामने चुनौतियां बदल गयी हैं. आज आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा है जब अमेरिका ने आतंक की विभीषिका को झेला तब उसने इससे ३ दशकों से लड़ रहे भारत की परिस्थितियों का सही एहसास हुआ और उसने बहुत कड़े नियम बना दिए जिससे आज भी अमेरिका में आने जाने वाले किसी भी मुसलमान को ज़िल्लत झेलनी पड़ती है पर इस बात पर अमेरिका किसी की भी नहीं सुनता है तो वह दूसरे देशों के मामलों में टांग क्यों अड़ाता है. इस तरह की रिपोर्टें यूएन को केवल कमज़ोर करने का काम ही करती हैं और देशों के बीच सद्भाव को केवल घटाने में ही इस्तेमाल की जा सकती हैं.   
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