मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 23 November 2012

फाँसी की राजनीति

                  कसाब को फाँसी देने के बाद से ही के बार फिर से संसद पर हमले में मौत की सजा पाए आतंकी अफ़ज़ल गुरु को भी जल्दी ही फाँसी पर लटकाने की बात की जाने लगी है. जिस तरह से केंद्र सरकार को निर्णय लेने के मामले में कमज़ोर माना जाता रहा है उसने राष्ट्रपति के यहाँ से कसाब की दया याचिका खारिज होने के बाद जितनी तेज़ी से उसे उसके अंजाम तक पहुँचाने का काम किया उससे विपक्षी दलों के हाथ से एक मुद्दा जाता रहा है. निसंदेह अफ़ज़ल गुरु भारत के राजनैतिक तंत्र का दोषी है क्योंकि उसने भारत के लोकतंत्र के उस हिस्से पर चोट करने की कोशिश की थी जहाँ से नेता लोग पूरे जीवन भर सुख भोगने का हक पा जाते हैं फिर भी उसको मौत की सजा देने में जिस तरह से राजनीति की जाने लगी है उसका कोई औचित्य नहीं है. यह सही है कि विभिन्न कारणों से अफ़ज़ल को अभी तक फाँसी नहीं दी जा सकी है पर आज देश के कुछ लोग इसे जिस दिशा में घुमाने की कोशिश कर रहे हैं वह अपने आप में चिंताजनक है. देश में मौत की सजा पाए आतंकियों के लिए जो कुछ भी निर्धारित प्रक्रिया है उसके तहत शिंदे को राष्ट्रपति कार्यालय से प्रपत्र फिर से भेज दिए गए हैं गृह मंत्रालय से रिपोर्ट मिलने के बाद ही राष्ट्रपति इस याचिका पर फ़ैसला कर सकते हैं आख़िर कसाब पर भी फ़ैसला हुआ ही है तो अब देश कि अन्य मसलों पर थोड़ी प्रतीक्षा करनी ही होगी.
           आज केंद्र पर इस बात के आरोप लगते हैं कि वह आतंकियों के साथ नरमी से पेश आती है पर क्या केंद्र में बैठी किसी भी सरकार को नीतियों पर बड़े फैसले लेने का अपने दम पर अधिकार मिला हुआ है ? देश की कानून व्यवस्था में इतने अधिक स्पीड ब्रेकर पहले से ही बने हुए हैं कि कोई भी दल या सरकार चाहे तो वहां पहुँच कर किसी भी फ़ैसले की रफ़्तार को अपने हिसाब से कम या ज्यादा कर सकती है जिससे नीति और कानून तो अपनी जगह पर ही रहते हैं पर देश का कबाड़ा हो जाया करता है. कश्मीर से अलगाववादी नेता यासीन मालिक ने जिस तरह से अफ़ज़ल के पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर दिया है उससे क्या साबित होता है कि वह अब दबाव की राजनीति को हवा देकर घाटी का माहौल बिगाड़ने पर लगे हुए हैं. यासीन मालिक को कश्मीरियों की चिंता हो रही है और वे अब यह कह रहे हैं कि आम कश्मीरी अब अफ़ज़ल के लिए चिंतित है पर जब संसद पर हमला हुआ था तो कोई कश्मीरी क्यों चिंतित नहीं हुआ था जबकि वह हमला देश पर ही था ? जब घाटी से कश्मीरी पंडितों को चुन चुन कर मारा और भगाया जा रहा था तब यह कश्मीरियत कहाँ सो रही थी क्यों तब आम कश्मीरी मुसलमानों ने इसका कोई विरोध नहीं किया था ?
           मतलब साफ़ है कि आज भी ऐसे लोग भारतीय लोकतंत्र में अपनी बकवास करने के लिए उपलब्ध हैं और लोकतंत्र की मजबूरी यह है कि इन्हें सुरक्षा भी भारत सरकार ही दे रही है आज जो यासीन मालिक कश्मीरियों की बात करते हैं वे तब क्यों चुप हो जाते हैं जब राज्य को सबसे अधिक पर्यटन राजस्व देने वाली वार्षिक श्री अमरनाथ यात्रा को रोक कर कश्मीरियों को उनके लिए कुछ काम करने से रोकने का प्रयास किया जाता है ? अगर इस तरह के चंद कश्मीरी नेताओं को यह लगता हा कि राज्य के लोगों की आर्थिक स्थिति पर चोट पहुंचाकर कुछ हासिल किया जा सकता है तो वे ग़लतफ़हमी में ही जी रहे हैं क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि ज़ुल्म हद से बढ़ जाने के बाद मुसलमानों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ हथियार न उठाये हों ? आज अरब देशों और मध्यपूर्व के अधिकांश इस्लामी देश आपस में हो इतना क्यों संघर्ष कर रहे हैं जबकि वहां पर उन पर कोई दबाव नहीं है. कहीं ऐसा न हो कि जिन भाड़े के कश्मीरियों की बात मालिक जैसे लोग कर रहे हैं एक दिन वे खुद ही आगे बढ़कर इन जैसों को रास्ते का काँटा समझकर बाहर कर दें ? भारतीय सुरक्षा बलों के दम पर सांस लेने वाले इन कश्मीरी नेताओं को इस बात का एहसास है कि यदि उनकी सुरक्षा भारत न करे तो उनके प्रतिद्वंदी कोई किसी और कट्टर लश्कर, तंजीम का आतंकी इनको मार ही डालेगा फिर भी ये अपनी स्थिति को न समझते हुए सनसनी फ़ैलाने के काम से चूकते नहीं है.    
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