मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 22 November 2012

दहेज़ की सूची और कानून

                     शादी के समय दिए जाने वाले दहेज़ या दान की सूची को सार्वजनिक करने पर रोक लगाने से सम्बंधित एक याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नामंज़ूर करते हुए कहा कि इसे अवैधानिक नहीं कहा जा सकता है. शादी के समय इस तरह के प्रदर्शन को रोकने के लिए कुरैशी वेलफेयर सोसाइटी द्वारा न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की गयी थी जिस पर कोर्ट ने खुद याचिकाकर्ता से यह सवाल पूछा कि दहेज़ या दान की परिभाषा क्या है और यह किस तरह से अवैधानिक ठहराया जा सकता है जिस पर याचिकाकर्ता की तरफ़ से संतोषजनक उत्तर न मिल पाने के कारण इसे खारिज़ कर दिया गया. निसंदेह आज के समय में जिस तरह से दिए जाने वाले सामान की प्रदर्शनी लगायी जाती है उससे समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों पर भी इस तरह से प्रदर्शन का दबाव बनता है और वे किसी भी तरह से इसे करने के लिए बाध्य हो जाते  पर इस पूरे प्रदर्शन के प्रकरण को रोकने के लिए आज के समय में कानूनी तौर पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है क्योंकि कानून दहेज़ लेने और देने को ग़लत मानता है पर स्वेच्छा से दी गयी वस्तुओं पर रोक लगाने का अधिकार कानून के पास आज भी नहीं है.
          स्पष्ट कानून न होने के कारण भी कोर्ट ऐसे मामलों में दखल नहीं दे सकता है जबकि इसका समाज पर बुरा असर पड़ता ही है. दहेज़ देना कन्या पक्ष अपनी हैसियत के हिसाब से करता है पर जब इसमें कई बार दबाव भी बन जाता है जिससे पूरी प्रक्रिया का दूसरा स्वरुप ही सबके सामने आ जाता है. कन्या को अपनी इच्छा से सब कुछ देने का प्रयास हर माँ बाप करते हैं पर जिस तरह से आज इसको प्रदर्शन और प्रतिष्ठा से जोड़ लिया गया है उसका किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं किया जा सकता है. इस याचिका को जिस तरह से आधी अधूरी तैयारी के साथ कोर्ट के सामने विचार के लिए रखा गया उसने भी इसको खारिज़ करवाने में बड़ी भूमिका निभाई क्योंकि कोर्ट को कानून के साथ तथ्यों पर चलना होता है और कई बार आवश्यकता पड़ने पर ही कोर्ट कानून से अलग हटकर कोई टिप्पणी करती है जिसका अन्य बातों में विश्लेषण करने के लिए मतलब निकाला जाता है. आज के समय में जिस तरह से कई बार केवल प्रचार पाने के लिए भी इस तरह की याचिकाएं कोर्ट में डाली जाने लगी हैं जिनका कोई मतलब नहीं है तो कोर्ट के पास इनको खारिज़ करने के अलावा और कोई रास्ता भी शेष नहीं बचता है.
          इस तरह के प्रयास को कानूनी जामा पहनाने के स्थान पर अगर समाज अपने स्तर से ठोस प्रयास करे तो इस स्थिति को बदला भी जा सकता है क्योंकि कानून केवल दिशा निर्देश दे सकता है समाज के उस वर्ग को इस बारे में प्रयास करना होगा जो समाज के अन्य लोगों के लिए प्रदर्शक का काम करता है पर बेहद विलासिता के जीवन को जी रहे लोग किसी भी स्तर पर अपनी बेटियों की शादियों में किसी भी तरह से कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते हैं जिससे भी यह स्थिति सुधरने नहीं पाती है क्योंकि जिन पर सुधार का ज़िम्मा होना चाहिए वे ही दिखावे में लगे हुए हैं ? सामाजिक कुरीतियों और बुराईयों से निपटने के लिए कानून एक ढाल तो बन सकता है पर वह तलवार बनकर कभी भी वार नहीं कर सकता है. इसलिए कानून के प्रावधानों का उपयोग करते हुए यदि हम सभी समाज में परिवर्तन लाने के प्रयास करें तो इससे आने वाले समय में कुछ परिवर्तन दिखाई दे सकता है. जिन लोगों को बिना बात प्रदर्शन करने की आदत पड़ी हुई है वे किसी भी परिस्थिति में उससे दूर नहीं हो पायेंगें और समाज में सुधार करने का प्रयास करने वालों के लिए हमेशा ही चुनौती के रूप में सामने आते रहेंगें.    
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