मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 30 November 2012

कार और सुरक्षा

                    आज के समय में घर में एक कार रखने का हर मध्यमवर्गीय परिवार का सपना होता है और देश में आम आदमी की सुधरती हुई आर्थिक स्थिति ने अब कार बाज़ार में खरीददारों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी कर दी है. अब देश में पहले के मुकाबले अधिक कारें बिकने लगी हैं जिसका लाभ उठाने के अधिकांश बहुराष्ट्रीय कार कम्पनियों ने भी अब भारत में अपने निर्माण केंद्र खोल लिए हैं. ऐसे में जब उपभोक्ताओं की लम्बी कतारें कुछ विशेष कारों को खरीदने के लिए दिखाई देती हैं उस स्थिति में सस्ती और अच्छी कार उपलब्ध कराना कार कम्पनियों के लिए के चुनौती बनती जा रही है. भारतीय बाज़ार में आज भी उपभोक्ता को सब कुछ मानने का चलन नहीं आ पाया है जिस कारण से आज भी यहाँ पर कार बनाने वाली कम्पनियां अपने आर्थिक हितों के आगे सुरक्षा पर कम ध्यान देती हैं. इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है भारत में लोग सस्ती कारें खरीदने के चक्कर में सुरक्षा मानकों से समझौते करते हैं जिससे किसी दुर्घटना के समय उनकी जान पर बन आती है. आज भी दुर्घटनाओं में छोटी कारों में सफ़र करने वाले अधिक हताहत होते हैं जिससे इन कारों की सुरक्षा पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता महसूस होती है.
          जहाँ तक कार सुरक्षा से जुड़े नियमों की बात है तो अभी तक भारत में ऐसे कोई स्पष्ट दिशा निर्देश कार कम्पनियों के लिए बनाये ही नहीं गए हैं जिनके अनुसार यह सुनिश्चित किया जा सके कि किस श्रेणी की कार में कौन से सुरक्षा मानक होने आवश्यक हैं जिससे तेज़ी बढती प्रौद्योगिकी के कारण गाड़ियों की रफ़्तार तो बढती जा रही है पर उसमें उस स्तर के सुरक्षा मानकों का प्रयोग नहीं किया जाता है जो उनकी रफ़्तार के अनुसार होने आवश्यक हैं. इसका सीधा असर इनमें सफ़र करने वाले लोगों पर पड़ता है क्योंकि तेज़ रफ़्तार और खुली सड़कों पर चलते समय सुरक्षा की परवाह कौन करना चाहता हैं जिसे भी बहुत सारी दुर्घटनाएं होती रहती हैं. अब यहाँ पर सवाल यह उठता है कि इन सुरक्षा मानकों को अपनाये जाने के लिए इन कार कम्पनियों को स्पष्ट दिशा निर्देश देने का काम आख़िर अभी तक क्यों नहीं किया जा सका है ? देश को रफ़्तार के साथ सम्पूर्ण सुरक्षा से युक्त गाड़ियों के साथ इनके अनुरूप राजमार्गों की आवश्यकता है. कई राज्यों ने अपने यहाँ मार्गों में अभूतपूर्व सुधार करके सड़क यातायात को बहुत तेज़ भी कर दिया है पर साथ ही इन पर चलने वाली गाड़ियों की सुरक्षा के बारे में कुछ भी सोचा तो जाता है पर उस पर अमल करने पर ध्यान नहीं दिया जाता है.
          अब देश में कार उपभोक्ताओं, राजमार्ग प्राधिकरण, उद्योग मंत्रालय, मानव संसाधन मंत्रालय और कार व्यवसाय में लगी हुई कंपनियों की यह साझा ज़िम्मेदारी बनती हैं कि वे इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने के बाद कुछ नियमों को इस तरह से बनायें कि उनसे बचना आसान न हो और साथ ही वे नियम इतने कठोर भी न हों कि उनके अनुपालन के चक्कर में कार कम्पनियां ग्राहकों से मुनाफ़ा बटोरने के लिए कीमतों में मिलजुल कर बढ़ोत्तरी कर दें ? कार निर्माताओं को यह समझना होगा कि जो व्यक्ति उनकी कार खरीद रहा है उसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय करने की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही है क्योंकि केवल कार बेच लेने से अब सब कुछ ठीक नहीं रहने वाला है और आने वाले समय में कार उपभोक्ताओं में भी इस बात को लेकर जागरूकता बढ़ने वाली ही है तब अचानक ही इस तरह के सुरक्षा मानकों को लगाये जाने से बढ़ने वाली क़ीमतों पर क्या स्पष्टीकरण दिया जायेगा ? देश में इन सबके साथ राजमार्गों के किनारे स्थित कस्बों और गांवों के लोगों को भी सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए और इन स्थानों के स्कूलों के बच्चों को सड़क सुरक्षा के बारे में अलग से बताया जाना चाहिए क्योंकि जानकारी के अभाव में ये बच्चे अपने साथ सड़क पर चलने वाले तीव्र गति के वाहनों में सवार लोगों की सुरक्षा के लिए ख़तरा बनते रहते हैं. 
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