मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 10 February 2013

राष्ट्रीय असहमति और वोट बैंक

               अजमल कसाब के बाद अफज़ल गुरु की दया याचिकाओं पर तेज़ी से निपटारा करते हुए दोनों आतंकियों की जिस तरह से फाँसी दी गयी और उसके बाद अब देश के नेता इसके लिए खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और विरोधियों को बुरा भला कह रहे हैं क्या आज के सन्दर्भ में इसकी कोई आवश्यकता भी है ? यह सही है कि देश के सामने अंतर्राष्ट्रीय आतंक का साया भी उतना ही बड़ा है जितना अन्य देशों के सामने है पर अभी तक जिस तरह से आतंकियों से जुड़े मुद्दों पर राजनीति कर देश का नुकसान किया जाता रहा है यह बहुत चिंतनीय है क्योंकि आतंकियों का कोई धर्म ईमान नहीं होता है वे मानसिक रूप से बीमार और ग़लत सोच रखने वालों के प्रति समर्पित होते हैं जिन्होंने किसी भी तरह का भय या प्रलोभन देकर युवाओं को गुमराह करने को ही अपना धर्म मान रखा है. कश्मीर के मुद्दे पर पाक ने १९४७ से ही जो रवैया अपना रखा है वह उसके हितों के अनुसार सही हो सकता है पर भारत के नेताओं की तरफ़ से भी इस मुद्दे पर लगातार गलतियां किये जाने से यह उलझता ही जा रहा है. किसी भी दूरगामी, संवेदनशील, राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दे पर बोलते समय देश के सभी नेताओं और राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों या प्रवक्ताओं को उन मर्यादाओं का पालन अवश्य ही करना चाहिए जिनसे देश की साख बची रहे.
              आज हर एक बात पर सरकारों से असहमति दिखाने का जो नया ट्रेंड चल पड़ा है उसकी भारत जैसे भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में कितनी आवश्यकता है यह सोचने का विषय है पर आज किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह इस दिशा में सोचे ? इस मामले में सबसे ज्यादा स्थिति टीवी न्यूज़ चैनल्स के सजीव कार्यक्रमों से बिगड़ती है क्योंकि कहने के लिए बड़े बड़े राजनेता जिस तरह से निम्न स्तर तक गिरकर अपनी बातों को रखने को ही प्राथमिकता देते हैं उससे उनके स्तर का ही पता चलता है. क्या आज देश को इस तरह से किसी बड़े मुद्दे पर राजनीति करने की आवश्यकता है जिस पर ऐसा कुछ भी करने से देश का ही नुकसान हो सकता है ? क्या देश के नेताओं को यह नहीं पता है कि केवल राजनीति करने से ही आज देश की यह दुर्गति होती जा रही है क्योंकि जब देश हित के मुद्दों पर भी इस तरह से राजनीति की जाती रहेगी तब तक सही दिशा में कोई क़दम कैसे उठाया जा सकेगा ? नेताओं को वोट बैंक सँभालने के लिए अन्य बहुत सारे अवसर भी मिलते रहते हैं पर आज जिस तरह से इतनी क्षुद्रता और बेशर्मी के साथ राजनैतिक हितों को साधा जाता है वह किसके हित में हो सकता है ?
            क्या देश में कुकुरमुत्ते की रोज़ ही उगते हुए नए दलों और पुराने दलों में से कोई नेता यह बताने के लिए आगे आएगा कि देश की आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे पास कोई कारगर तंत्र क्यों नहीं है जो आतंकियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम हो ? क्यों आज तक देश में आतंकी गतिविधियों में शामिल लोगों को सज़ा देने के लिए हमारे पास फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं हैं और क्यों हम हमेशा ही आतंकी गतिविधियों को राजनैतिक चश्मे से देख कर हमेशा ही दूसरे को नीचा दिखाने का काम किया करते हैं ? क्या देश में अन्य कोई मुद्दे ही नहीं बचे हैं जो हर समय सरकारों पर हमले करने के लिए केंद्र या राज्यों में विपक्षियों को इस तरह के घटिया टोटकों पर भरोसा करना पड़ता है क्या उन्हें यह लगता है कि देश की जनता इतनी भोली और नासमझ है कि वह इस बात को भी नहीं समझती है ? देश की जनता को इन बातों में उलझाने के स्थान पर यदि देश का राजनैतिक तंत्र संसद में बैठकर आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए एक कड़े कानून और तीव्र सुनवाई की प्रक्रिया पर मोहर लगाकर उसे कानूनी दर्ज़ा दे सके तो उससे देश का बहुत भला हो सकेगा पर केवल पाने वोट बैंक की चिंता में घुले जा रहे नेताओं के लिए क्या यह सब कर पाना इतना आसान होगा या फिर इस तरह की परिस्थितियों में हम फिर नेताओं के नाटक को टीवी पर देखेंगें....     
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