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Wednesday, 20 February 2013

बिहार और आर्थिक प्रगति

                     २०१२-१३ की आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट विधान सभा में प्रस्तुत करते समय उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने जिस तरह से आज तेज़ी से आगे बढ़ते हुए बिहार की तस्वीर पेश की है वह पूरे देश के लिए गर्व की बात है क्योंकि अभी तक इस तरह की रिपोर्ट में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए राज्यों को ही शामिल किया जाता था और यूपी, बिहार, एमपी, छत्तीसगढ़, राजस्थान और ओडिशा का स्थान कहीं पर भी दिखाई नहीं देता था. आज आर्थिक प्रगति जिस तरह से विकास का नया पैमाना बन चुकी है उस स्थिति में बिहार का यह सर्वोत्तम प्रदर्शन एक नई आस जगाने वाला है क्योंकि अब कोई भी बिहार की तरफ ऊँगली उठाकर उसे देश के विकास में अवरोधक करार नहीं दे सकता है. निश्चित तौर पर नितीश कुमार और बिहार की जनता के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि उन्होंने जिस परिस्थिति में बिहार की सत्ता को संभाला था उसमे किसी को भी इस तरह की प्रगति की आशा नहीं थी. आज बिहार भी यह कह सकता है कि उसने गुजरात की बहु प्रचारित ग्रोथ को भी पीछे छोड़ दिया है गुजरात से तुलना सिर्फ़ इसलिए क्योंकि अभी भी लोगों को यही लगता है कि देश में विकास का पैमाना केवल गुजरात ही निर्धारित कर सकता है.
                     अनिश्चितता और आतंक के माहौल से आज प्रगति के पथ पर तेज़ी से आगे बढ़ते हुए बिहार से पूरे देश को लाभ मिलने वाला है क्योंकि जब भी देश की बड़ी आबादी वाले राज्य में विकास की लहर आती है तो वहां से धरातल पर होने वाले विकास से वास्तव में लोगों के जन जीवन पर भी महत्वपूर्ण असर पड़ता है. आज तक देश में पिछड़ेपन की तुलना करने में सभी सबसे पहले बिहार का नाम लिया करते थे पर अब बिहार के विकास परक नेतृत्व ने अपने दम पर यह भी दिखा दिया है कि यदि सपने देखने की आदत बनाई जाये तो उन्हें पूरा करने की हिम्मत भी अपने आप ही आ जाती है. बिहार एक समय में राजनैतिक और सामजिक क्षेत्र में देश के लिए सबसे बदनाम राज्य हुआ करता था जो अपने जातीय राजैतिक दुश्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहा था पर जिस तरह से नितीश सरकार ने लोगों के भरोसे को वापस लौटाया है वह भी प्रशंसा के योग्य है क्योंकि विकास के पथ पर चलते हुए राज्य में कुछ करने से अधिक किसी पिछड़े हुए राज्य में आगे चलने की ईमानदार कोशिश देश में कम ही दिखती है.
                     बिहार की इस प्रगति से एक बात तो साबित हो ही जाती है कि यदि नेतृत्व सबल हो तो किसी भी राज्य में विकास की धारा बहाई जा सकती है पर देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में आज भी सबल नेतृत्व की तलाश जारी है. बिहार के विकास को मॉडल मानकर अन्य राज्य इस तरह से आगे बढ़ने के बारे में कभी सोचना ही नहीं चाहते हैं जिससे भी देश के लिए नई समस्याएं पनपती रहती हैं. यदि किसी समय में देश में पिछड़ेपन की निशानी रहा बिहार आज आर्थिक प्रगति में गुजरात को पीछे छोड़ सकता है तो अन्य राज्यों में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है पर आज भी पहले की तरह के बिहार की तरह यूपी में जातीय समीकरण हमेशा ही विकास पर हावी होते रहते हैं जिससे यूपी की प्रगति के साथ पूरे देश की प्रगति बाधित होती है. अब केंद्र सरकार को आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों द्वारा इस तरह की विकास परक क्षमता के साथ आगे बढ़ने पर उनके लिए विशेष प्रोत्साहन के बारे में सोचना चाहिए जिससे ये राज्य भी देश की आर्थिक प्रगति में गति अवरोधक बनने के स्थान पर विकास के राजमार्ग बन सकें. इस मसले पर आज तक की जाने वाली राजनीति से पूरी तरह पीछा छुड़ाने की आवश्यकता है क्योंकि अब यही देश के विकास का मूल मंत्र बन सकता है.     
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