मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 31 March 2013

निताक़त कानून और भारतीय कामगार

                                  सऊदी अरब के नए निताक़त कानून ने जिस तरह से वहां काम कर रहे भारतीय कामगारों समेत अन्य देशों के लोगों पर भी असर डालना शुरू कर दिया है उससे निपटने की कोई योजना या दिशा अब भारत सरकार के पास नहीं है क्योंकि यह सऊदी अरब द्वारा उसके अपने युवाओं को नौकरी देने और विभिन्न तरह के रोज़गार उपलब्ध कराने की दिशा में उठाया जा रहा एक क़दम है और यह पूरी कवायद वहां के शासकों ने जनता के भारी दबाव के बाद ही करने का फैसला किया है जिस कारण से बचने के साधन जुटा पाना भी आसान नहीं होने वाला है. इस नए निताक़त कानून के मुताबिक अब सऊदी में काम करने वाली किसी भी कम्पनी या छोटे मझोले उद्योग के साथ अन्य काम करने वाले लोगों को अपने यहाँ पर १०% रोज़गार स्थानीय निवासियों के लिए आरक्षित करनी होगी क्योंकि आज जिस तेज़ी से सऊदी में युवाओं में बेरोज़गारी बढ़ रही है उससे अपनी अभी तक चल रही ग़लत नीतियों के कारण वहां की सरकार समझ ही नहीं पाई और जन आंदोलनों के दबाव में उसे इस तरह के क़दम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है.
                              दुनिया भर के मुसलमानों में सऊदी अरब जाकर काम करने की एक लालसा हमेशा से ही रही है और वहां पर अभी तक जिस तरह से अमीर लोग काम करने के लिए कामगारों की तलाश में रहा करते थे वह मांग काफी हद तक भारत से पूरी होती चली गयी जिससे धीरे धीर वहां पर काम करने वाले भारतीयों की संख्या निरन्तर बढती ही चली गयी. इन प्रवासी कामगारों ने अपनी कुशलता के दम पर जिस तरह से वहां के निवासियों में अपनी प्रतिभा और निष्ठा का लोहा मनवाया उससे यह संख्या बढ़ती ही चली गयी. एक अनुमान के अनुसार आज वहां पर लगभग पौने छह लाख केरल के कामगारों समेत बीस लाख भारतीय काम कर रहे हैं. स्थानीय दबाव के कारण जिस तरह से यह नया कानून लागू किया जा रहा है उस स्थिति में जहाँ एक तरफ इस तरह के व्यवसाय को चलाने वालों के लिए कामगारों की समस्या होने वाली है वहीं उन पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ने वाला है क्योंकि सरकार ने काम के ८ घंटे निर्धारित करने के साथ न्यूनतम मजदूरी ३००० हज़ार रियाल करने की नीति बनायीं है. इस स्थिति में एक दम से इन कुशल कामगारों की जगह पर मंहगी श्रम शक्ति के दम पर वह के काम किस तरह से चल पायेंगें यह तो समय ही बता पाएगा.
                    आज की इन परिस्थितियों को देखते हुए जहाँ केरल और आंध्र प्रदेश की सरकारें केंद्र सरकार समेत सीधे सऊदी सरकार के श्रम मंत्रालय से संवाद कर रही हैं वहीं यूपी और बिहार सरकारें इस बारे में चुप ही बैठी हुई हैं. केरल सरकार ने जहाँ के तरफ किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए सस्ती दरों पर एयर इंडिया के किराये तक की बात भी कर ली है वहीं इस बात पर भी बात की है कि इन कामगारों के पासपोर्ट पर किसी भी तरह का कुछ भी न लिखा जाये क्योंकि इस तरह की प्रक्रिया उनके भविष्य में विदेशों में काम करने की संभावनाओं पर भी बुरा असर डाल सकती है. वैसे देखा जाये तो इस मामले में भारत और राज्य सरकारें केवल सऊदी सरकार से रियायत की उम्मीद ही कर सकती हैं जिसकी संभावनाएं कम ही नज़र आ रही हैं क्योंकि किसी भी स्थानीय परिस्थिति के अनुसार कानून बनाना किसी भी देश का संप्रभु अधिकार है उसमे कोई भी देश किसी भी तरह से दखल नहीं दे सकता है. इस विपरीत परिस्थिति में अब भारत सरकार के साथ राज्य सरकारों को भी इन कामगारों के लिए कोई मज़बूत और काम करने वाली पुनर्वास नीति बनानी ही होगी जिससे इनकी इस श्रम शक्ति का सही दिशा में उपयोग किया जा सके और देश को इनसे कुछ लाभ मिल सके.  
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