मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 20 April 2013

दिल्ली और रेप

                                देश की राजधानी दिल्ली में जिस तरह से एक बार फिर से ५ वर्ष की बच्ची के साथ दुष्कर्म की बात सामने आई है और उसके बाद पीड़ित परिवार के साथ पुलिस ने जिस तरह से रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करने के साथ विरोध कर रही एक अन्य लड़की को एसीपी स्तर के अधिकारी द्वारा थप्पड़ मारने की घटनाएँ हुई हैं उससे यही लगता है कि आज पूरे समाज में कहीं न कहीं कोई बहुत बड़ी कमी आ चुकी है. दिसंबर में बस में होने वाले दुष्कर्म के बाद जिस तरह से दिल्ली में उबाल आया था और उसके बाद सरकार को रेप और महिलाओं के ख़िलाफ़ किये जाने वाले अन्य अपराधों की रोकथाम के लिए जिस तरह से कड़े कानून बनाने के लिए मजबूर किया और कानून बन भी गया तो उसके बाद अब सरकार के पास करने के लिए क्या बचता है ? एक काम जो वास्तव में सरकार कर सकती है कि समाज में जागरूकता लायी जाये और किसी भी उम्र की बच्ची को किसी भी परिस्थिति में अकेले छोड़ने से बचने को हमें खुद ही बचने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि अभी तक जो कुछ भी होता दिख रहा है उसमे कहीं न कहीं से हम सामाजिक स्तर पर ही पिछड़ रहे हैं ?
                सरकार के पास जो सबसे बड़ा काम होना चाहिए कि वह कम से कम पुलिस और अन्य अधिकारियों को मानवता का इतना प्रशिक्षण दे ही सके कि वे थाने या अन्य किसी प्रशासनिक कार्यालय में शिकायत लेकर आने वाले लोगों के साथ उचित व्यवहार तो करे ही क्योंकि पता नहीं कैसे इन पदों पर बैठे हुए लोगों मन क्या भावना आ जाती है कि वे अपने को समाज और कानून से भी ऊपर समझने लगते हैं जबकि उन पर समाज और कानून के नियमों के अनुपालन की अधिक ज़िम्मेदारी होती है. ऐसी किसी भी अप्रिय स्थिति को सँभालने के लिए पुलिस के पास जो मानवीय चेहरा होना चाहिए वह आज भी कहीं से दिखाई नहीं देता है जिस कारण से भी कुछ असामाजिक तत्व अपने काम को आसानी से अंजाम देकर पुलिस के द्वारा पीड़ितों पर ही दबाव बनाते दिखाई देते हैं. आज भी हमारे पुलिस और प्रशासनिक तंत्र में वह संवेदनशीलता कहीं से भी दिखाई नहीं देती है जिसकी देश और समाज को आवश्यकता है और उस स्थिति में सरकार पर यह दबाव बनता है कि वह इन अधिकारियों को मानवीयता की भी उचित ट्रेनिंग देने का काम करे.
               इस तरह की किसी भी घटना में हम एक समाज के रूप में पूरी तरह से फेल हो चुके हैं क्योंकि जिस सामजिक मूल्यों से इस तरह की घटनाओं को समय रहते ही टाला जा सकता है और किसी भी परिस्थिति में पूरे समाज को सुरक्षित किया जा सकता है हम वह भी नहीं कर पा रहे हैं. सरकारें कड़े से कड़ा कनून ही बना सकती हैं पर समाज में बदलाव की ज़िम्मेदारी आखिर समाज पर ही आती है क्योंकि हम जिस तरह से बहुत कम पुलिस के साथ जी रहे हैं उस स्थिति में किसी भी सरकार से यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह अपने काम से ही पूरे समाज को बदलने में सक्षम हो सकती है ? यदि इस तरह की घटनाएँ रोक पाने में क्या हम एक सभी समाज के रूप में सफल हो पा रहे हैं जो किसी सामाजिक बुराई के लिए सरकार पर ऊँगली उठाने में हम आगे आ जाते हैं ? इस तरह के मामलों में अब कड़े प्रावधान भी कर दिए गए हैं पर उससे हमे क्या हासिल हो पाया है कुछ भी नहीं क्योंकि हम एक सामजिक प्राणी के रूप में पूरी तरह से असफल साबित हो रहे हैं ? सरकारें हमसे ही हैं और जब हमारा महिलाओं के प्रति नजरिया इतना गिरा हुआ हो चुका है तो कोई भी सरकार हमें कैसे सुधार सकती है हमें अब खुद ही आगे बढ़कर समाज में अपनी बच्चियों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए उचित बदलाव के बारे में सोचना होगा.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (21-04-2013) के चर्चा मंच 1220 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  2. ऐसे लोग समाज के लिए मानसिक रूप से विकृत होते हैं जिनकी समाज को कोई जरुरत नहीं ...लेकिन पता नहीं क्यूँ कोर्ट कचेहेरी और फिर सजा वो भी पता नहीं कब होगी या नहीं होगी .... तब तक कितनी और बेटियां बलि का बकरा बनेंगी ...

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