मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 24 April 2013

हज यात्रियों की तकलीफ़ें

               इस वर्ष हज यात्रा पर जाने की कोशिशों में आवेदन करने आने वाले संभावित हज यात्रियों के साथ अपने हज यात्रा के स्मरण सुनाते हुए यूपी के ताक़तवर कैबिनेट मंत्री आज़म खाँ ने जिस तरह से वहां पर होने वाली तकलीफ़ों को बयां किया उससे यही लगता है कि धार्मिक आस्था के साथ सऊदी अरब जाने वाले आम मुसलमानों के साथ वहां पर सामान्य मानवीय व्यवहार भी नहीं किया जाता है. अच्छा ही है कि एक मंत्री के रूप में अपने विशेषाधिकार का प्रयोग न करते हुए आज़म ने एक सामान्य हज यात्री की मुश्किलों से दो चार होने की कोशिश की जिससे उन्हें यह पता चल सका कि वास्तव में बिना किसी रुतबे के हज करना अपने आप में कितना कष्टकारी काम हो चुका है पर इस बात के लिए आज भी देश या प्रदेश की सरकारें सऊदी दूतावास से किसी भी तरह की नाराज़गी या बेहतर सुविधाओं के लिए कुछ करने के लिए कुछ नहीं करना चाहती हैं उसके पीछे उनकी क्या मंशा हो सकती है ? बिना कद विरोध किये किसी से भी कुछ पाने की आशा आज के समय में कैसे संबव है और जब सऊदी सरकार हर सुविधा देने के लिए रूपये लेती है तो उससे सुविधाओं की मांग करना भी ग़लत तो नहीं है.
               सरकारी स्तर पर क्या सऊदी सरकार किसी अन्य देश की हज के दौरान सुविधाएँ दिए जाने की किसी भी मांग पर विचार करने के लिए तैयार भी है आज हमें इस बात पर ही विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि जब दुनिया के किसी भी हिस्से में जब हम किसी इतने बड़े धार्मिक आयोजन की बात करते हैं तो उसमें सरकारों का लगाव अपने आप ही हो जाता है पर हज जिसे हर मुसलमान के लिए फ़र्ज़ भी माना गया है अगर उसके लिए भी इतनी बड़ी धनराशि खर्च करने के बाद भी यात्रियों को दर दर की ठोकरें खाने पर पजबूर किया जाए तो उसके लिए किसी ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है ? वैसे भी भारत में मेहमानों का जिस तरह से स्वागत करने की परंपरा रही है और बड़े आयोजनों के अवसरों पर भी जितनी आसानी से सारा कुछ संभाला जाता है उसके बाद किसी को भी किसी अन्य देश में इस तरह से सामान्य यात्रियों के साथ इस तरह का व्यवहार रास नहीं आएगा और जब आज़म ने खुद इस वर्ष महाकुम्भ की कमान संभाली हो और तैयारियों की बारीकियों को भी देखा और समझा हो तो उन्हें कुछ दर्द अधिक ही होता है.
                सऊदी में हवाई अड्डे से होटल और होटल से क़ाबा शरीफ़ तक की यात्रा के दौरान हज यात्रियों को जिस तरह से खादिमों और पुलिस की हर तरह की बातों को मानना पड़ता है वह भी अपने आप में पीड़ा दायक है क्योंकि यात्री अपनी मर्ज़ी से यदि खाना भी बना लें तो उसे फिंकवा दिया जाता है तो उस स्थिति में भूखे यात्रियों के पास और क्या चारा रह जाता है ? अपने जीवन की सबसे मुक़द्दस और सुकून देने वाली उसकी हज यात्रा जब इस तरह से पूरी होती है तो वह किससे अपनी यह बात साझा करे क्योंकि जिन आम मुसलमानों के दिल में क़ाबा शरीफ़ जाने की तमन्ना होती है उनसे वे क्या कहें कि उन्हें वहां पर क्या क्या झेलना पड़ा है ? इन दुश्वारियों पर उसका क़ाबा शरीफ़ तक पहुँचने और इबादत करने का जो मकसद पूरा होता है शायद उसके आगे ये परेशानियाँ बहुत कम ही होती हैं शायद इसीलिए भी वह इन परेशानियों का ज़िक्र किसी से भी नहीं करना चाहता है. मंत्री के रूप में आज़म को जो आम अनुभव हुए हैं उन पर कोरी राजनीति करके केवल बयान देने के स्थान पर उन्हें केंद्र सरकार और अन्य राज्यों की हज कमेटियों के साथ मिलकर सऊदी सरकार पर भारतीय हज यात्रियों को बेहतर सुविधाएँ दिलवाने का प्रयास करना चाहिए जिससे उन्हें हज यात्रा के दौरान जो सहना पड़ा है आने वाले समय में अन्य हज यात्रियों को उन कष्टों से दूर रखा जा सके पर राजनैतिक रोटियां सेंकने में माहिर आज़म शायद इस मसले को भी कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करने से नहीं चूकेंगें.      
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1 comment:

  1. अमरनाथ जाने वालों के लिये किसी को तकलीफ होती है क्या?

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