मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 26 June 2013

पन बिजली और पर्यावरण

                              उत्तराखंड की आपदा ने देश को एक बार फिर से आर्थिक और सामाजिक विकास की महत्वपूर्ण इबारत लिखने वाले दस्तावेजों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है क्योंकि अभी तक पहाड़ी राज्यों में जिस तरह से बड़ी पन बिजली परियोजनाओं को लगाने में आने वाली विभिन्न तरह की दिक्कतों के कारण सरकार ने छोटी छोटी परियोजनाओं के दम पर देश में लगभग एक लाख यूनिट विद्युत् उत्पादन का लक्ष्य रखा था उसके पूरा होने में अब संदेह के बदल मंडराने लगे हैं. यह सही है कि हमारे देश में पहाड़ी राज्यों में पन बिजली के दोहन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं पर जिस तरह से राज्य और केंद्र सरकारें अपने सहयोगी उद्योगपतियों के हितों को साधने के लिए नियमों की अनदेखी किया करती हैं उस परिस्थिति में किसी भी तरह की चलायी जा सकने वाली परियोजना पर भी संकट आ ही सकता है. आज़ादी के समय हमारे पास आधारभूत संरचनाओं की बेहद कमी थी जिस कारण से भी बड़ी परियोजनाओं पर काम शुरू किया गया था पर आज स्थिति उलट जाने के बाद भी हम अपने को बदलने के लिए तैयार नहीं दिखते हैं ?
                              देश के संविधान में एक बार फिर से संशोधन की बहुत आवश्यकता है जिससे राज्यों और केंद्र के संबंधों को देश के प्राकृतिक संसाधनों के सीमित और बेहतर उपयोग के लिए कुछ नियमों में बदलाव की आज ज़रुरत सामने आ चुकी है. देश में राज्यों और केंद्र के सम्बन्ध जिस तरह से एक नाज़ुक डोर से बंधे रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर दोनों ही उनमें खींचतान करने लगते हैं उससे भी पूरी व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है. अब यह समय आ चुका है कि देश के संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए एक राष्ट्रीय नीति पर काम शुरू किया जाये क्योंकि केंद्र पर अपने हकों को रोकने के लिए चिल्लाने वाले राज्यों में प्राकृतिक आपदा के समय क्या स्थिति बन जाती है यह हम सदैव देखते ही रहते हैं और इस तरह की स्थिति में जब तक स्पष्ट और प्रभावी कानून सामने नहीं लाये जायेंगें तब तक केवल राजनैतिक खींचतान को ही सुर्खियाँ बनाने में माहिर हमारे नेता इस तरह की हरकतें करने से बाज़ नहीं आने वाले हैं.
                               देश के संसाधनों पर विचार करने के लिए देश के सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर एक समय बद्ध सीमा के अनुसार परिवर्तनों पर विचार किया जाना आवश्यक है क्योंकि कई बार कुछ राज्यों द्वारा अपने स्तर से इस तरह की परिस्थितियों से निपटा जाता है वह पूरे देश के लिए एक नए रास्ते को खोलने का काम भी कर सकता है. राज्यों के द्वारा किये जाने वाले अच्छे कामों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाये जाने के साथ ही अन्य राज्यों को इससे होने वाले लाभों के बारे में समझाया जा सकता है और उसी परिस्थितियों में उन रास्तों को अपनाकर तेज़ी से समस्या से पीछा भी छुड़ाया जा सकता है. देश को नए अन्य विवादों के स्थान पर विवाद कम करने वाले नियमों की आवश्यकता है पर आज भी हमारे नेताओं लिए केवल वोट ही महत्वपूर्ण हैं और कुछ भी नहीं. किसी भी आपदा से निपटने के लिए जिले स्तर पर जो ढांचा आवश्यक है वह संभवतः किसी राज्य के पास अभी तक नहीं बन पाया है जिससे भी समस्याएं पूरी तरह से और भी विकट हो जाया करती हैं. अब यह तो समय ही बताएगा कि आने वाले समय में हम और हमारे नेता कुछ सीख लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं या फिर वे भी केवल अपने काम को निकालने की पुरानी परंपरा पर ही चलते रहना चाहते हैं ? 
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