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Friday, 19 July 2013

कश्मीर और सख्ती के मायने

                                   जम्मू कश्मीर के रामबन इलाक़े में जी तरह से बीएसएफ के गश्ती दल द्वारा पहचान पत्र मांगे जाने के बाद बवाल किया गया उसके बाद वहां हुई फायरिंग में ४ लोगो की मौत हुई वह अपने आप में यही दिखाता है कि किस तरह से सामान्य सी दिखने वाली घटना के बाद माहौल को बिगाड़ने का काम किया जा सकता है ? वह भी तब जब वार्षिक अमरनाथ यात्रा चल रही है और इससे वहां के लोगों को आर्थिक लाभ भी मिलता रहता है. रामबन जैसे सामरिक और कश्मीर घाटी के लिए व्यावहारिक और आर्थिक रूप से अनिवार्य स्थान पर इस तरह से अराजकता फ़ैलाने की किसी भी कोशिश को कश्मीर में शांति से ही जोड़ना मजबूरी हो जाता है क्योंकि घाटी से दूर बसे इन इलाक़ों में छोटी छोटी बातों पर जिस तरह से असहिष्णुता का प्रदर्शन किया जाता है वह अंत में आम कश्मीरियों पर ही भारी पड़ने लगता है और उनका सामाजिक आर्थिक नुक्सान होता ही रहता है. कश्मीर में जारी आतंक के दौर में हर स्थानीय निवासी के पास आवश्यक पहचान पत्र होना ही चाहिए और यदि बीएसएफ ने अपनी उसी शक्ति के अंतर्गत किसी से उसकी मांग कर ली तो क्या यह इतना बड़ा मसला था कि उसे तूल दिया जाए ?
                                    घाटी में विशेष रूप से शांति का हर स्तर पर विरोध करने वाले सक्रिय तत्वों को सदैव यही लगता है कि यदि वहां तैनात भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा सामान्य रूप अपने काम को किया जाता रहा तो आने वाले समय में उनकी निष्पक्षता को देखते हुए आम कश्मीरी के मन में उनके लिए किसी भी प्रकार का संशय नहीं रह जायेगा जो कि किसी भी तरह से उनके लिए मददगार नहीं साबित हो सकता है इसलिए वे किसी भी तरह से आम कश्मीरियों को भड़का कर अपने काम को आसान करने का काम किया करते हैं. इस मामले में केन्द्रीय गृह मंत्री ने जिस तेज़ी से जांच के आदेश दिए हैं उससे मामले को शांत करने में अवश्य ही मदद मिलेगी पर उसका मतलब केवल सुरक्षा बलों के मनोबल को गिराना ही नहीं होना चाहिए क्योंकि वहां पर जिन परिस्थितियों में ये अपने काम को अंजाम दे रहे हैं उनमें किसी भी तरह से काम करना बहुत ही मुश्किल है. जांच में यदि पूरे मसले को देखा जाता है तो वह अच्छा रहेगा वरना केवल फायरिंग की जाँच के आदेश से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है ? पहचान पत्र दिखने के स्थान पर उस व्यक्ति ने इतना हंगामा क्यों मचाया इस बात की पहले जांच होनी चाहिए क्योंकि उस व्यक्ति की ग़लत मंशा के बाद ही पूरा माहौल बिगड़ा था और उसके ख़िलाफ़ सही जांच के बिना इसके नतीजे सही ढंग से नहीं सामने आ सकते हैं.
                                  आज घाटी में जिस तरह से आतंकियों ने छुटपुट घटनाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति एक बार फिर से दर्ज करानी शुरू कर दी है और सुरक्षा बलों की सख्ती के कारण ही वे कुछ बड़ा नहीं कर पा रहे हैं तो इस तरह की घटनाओं के बाद वे कम से असंतोष को हवा देने में सफल ही होने वाले हैं. यदि पहचान पत्र की मांग करने के बाद बीएसएफ ने उस व्यक्ति को अनावश्यक अनावश्यक रूप से परेशान किया होता तो वह स्थानीय रूप से अपनी शिकायत भी कर सकता था क्योंकि आज मानवाधिकार के उल्लंघन के मुद्दे पर जिस तरह से वहां पर सुरक्षा बलों को संवेदनशील बनाये जाने का काम चल रहा है उसमें पीड़ित व्यक्ति की बात अवश्य ही सुनी जाती पर उसने जिस तरह से स्थानीय धार्मिक लोगों को इसमें शामिल कर सुरक्षा से जुड़े मुद्दे को धार्मिक रंग दे दिया उसका क्या निहितार्थ निकाला जा सकता है ? इस मामले में रामबन की जनता को भी पूरी तरह से निर्दोष नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उसकी मुद्दे को अलग ढंग से सोच ने ही चार लोगों की जान ले ली. भीड़ द्वारा घेरे जाने पर जिस तरह से सुरक्षा बल आत्म रक्षा में कार्यवाही करते हैं वहां भी वही सब हुआ ?   
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