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Sunday, 11 August 2013

पिछड़े राज्य और राजनीति

                              पिछड़े राज्यों की नई परिभाषा तय करने के लिए गठित समिति की रिपोर्ट शनिवार को आने के बाद जहाँ इस बात की संभावनाएं बढ़ती हुई नज़र आ रही हैं कि अब आने वाले समय में इन राज्यों के स्तर को निर्धारित करने के लिए सामाजिक स्तर को पीछे छोड़कर राजनैतिक स्तर पर अधिक बातें होने जा रही हैं. रिज़र्व बैंक के नव-नियुक्त गवर्नर रघुराम राजन की अगुवाई में बनी इस समिति ने जिस तरह से पिछड़े राज्यों की नई परिभाषा को निर्धारित करने का मन बनाया है उससे यही लगता है कि अब इसमें यूपी और बिहार भी आसानी से शामिल होने वाले हैं और यह केंद्र और कांग्रेस की तरफ से इन दोनों राज्यों में अपनी खोई हुई जड़ें तलाशने का एक क्रम भी हो सकता है ? पूरे देश कि लगभग एक चौथाई लोकसभा सीटों को रखने वाले इन राज्यों में इस तरह के किसी भी प्रस्ताव से वास्तव में कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर कुछ असर तो अवश्य ही पड़ सकता है और यदि सही मायनों में देखा जाए तो आज इन राज्यों के विकास की बहुत आवश्यकता भी है.
                              इस पूरे प्रयास में जहाँ ११ नए मानदंडों के अनुसार राज्यों को पिछड़ा घोषित करने का मन सरकार द्वारा बनाया जा रहा है उस स्थिति में यही लगता है कि प्रति व्यक्ति आय / व्यय और गरीबी रेखा के नीचे की जनसंख्या के साथ स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के अंतर्गत यूपी बिहार आसानी से पिछड़े घोषित हो ही जाएंगे क्योंकि इन क्षेत्रों में इतनी बड़ी आबादी के लिए अभी तक कोई बड़ा नीतिगत फैसला लेकर कुछ भी नहीं किया जा रहा है जिससे भी इन राज्यों में स्थिति बिगड़ती सी नज़र आती है ? नि:संदेह बिहार ने पिछले कुछ वर्षों में अपने यहाँ सब कुछ सुधारने का जो प्रयास शुरू किया है उसके लाभ भी दिखाई देने लगे हैं पर तीन दशकों में वहां पर जिस तरह से संसाधनों की लूट मचाई गई थी राज्य अभी भी उससे बाहर नहीं निकल पाया है. यूपी ने भी पिछले तीन दशकों में अपने निर्धारित विकास के लक्ष्य को पाने में जितनी सुस्ती दिखाई इसके लिए यहाँ के राजनैतिक नेतृत्व को ही दोषी ठहराया जा सकता है पर आज भी यूपी अपनी उसी पुरानी रफ़्तार को छोड़ना नहीं चाहता है जो उसके विकास में सबसे बड़ी बाधा है.
                           देश के लिए भी राज्य को उसकी वास्तविक स्थिति के अनुसार यदि किसी भी तरह की केन्द्रीय सहायता दी जाती है तो उसमें किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है पर इन कथित पिछड़े रहने के शौकीन राज्यों के नेताओं द्वारा जिस निरंकुशता के साथ राज किया जाता है उस पर भी कोई नियंत्रण अवश्य ही होना चाहिए क्योंकि जब तक किसी भी केन्द्रीय सहायता का सही दिशा में उपयोग नहीं किया जाएगा तब तक उसके वांक्षित परिणाम भी सामने नहीं आ पाएंगें ? आज जिस तरह से राज्यों के नेतृत्व को साधने के लिए केंद्र सरकार इतने प्रयास कर रही है यदि उनके नियोजित और नियमित सञ्चालन के साथ उस पर नज़र रखने की कोई पक्की व्यवस्था नहीं बनाई जाएगी तो इस भारी मात्रा में आने वाली केन्द्रीय सहायता के बन्दर बाँट को किसी भी तरह से रोका नहीं जा सकेगा ? वोट पाने के लिए योजनाएं बनाने और उनका संचालन करने करने का अधिकार देश के संविधान ने हर दल को दे रखा है पर हमारे दल उस अधिकार का जिस तरह से दुरूपयोग करने से नहीं चूकते हैं उस स्थिति में उनके ख़िलाफ़ क्या किया जाना चाहिए ? इस तरह से मिलने वाली किसी भी केन्द्रीय सहायता  की मॉनिटरिंग करने के लिए अब स्थानीय नेताओं को अलग कर केवल नागरिकों को इसमें सहभागी बनाया जाना चाहिए जिससे पूरी मंशा के साथ सही लाभ को सही स्तर तक पहुँचाने में पूरी मदद मिल सके.    
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