मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 17 August 2013

मोदी की वैश्विकता

                                            गोधरा काण्ड के बाद से ही जिस तरह से पश्चिमी देशों ने गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी को अपने यहाँ का वीसा देने से सिर्फ इसलिए मना करना शुरू कर दिया था कि उनको इस घटना का सीधे तौर पर ज़िम्मेदार माना गया था जिसके बाद से उन पर देश के अन्दर भी राजनैतिक रूप से हमला करने की एक अघोषित अन्य राजनैतिक दलों द्वारा चलायी जा रही है और उस विरोध के स्वरों के बीच मोदी ने जिस तरह से धीर धीरे अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाना शुरू किया अब उसके परिणाम दिखाई दे रहे हैं. इस सब विरोधों के बाद भी जिस तरह से मोदी ने पहले से ही विकसित राज्य की श्रेणी में पहुंचे हुए राज्य गुजरात में आधारभूत संरचनाओं पर जिस तरह से विकास के नए आयाम स्थापित किये आज पूरे विश्व में उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है. मोदी को वीसा देना आज भी बहुत सारे देशों के लिए उलझाव भरा मसला है क्योंकि उससे उनके यहाँ पर कथित मानवाधिकार वादियों को इस पर चिल्लाने का अवसर मिलता है जो सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने से नहीं चूकते हैं और भारत के अलावा अन्य देशों में मानवाधिकार का मसला आम जनता बहुत अच्छे से सुनती और उसका समर्थन भी करती है जिस कारण से उन देशों की सरकारों के लिए इस मसले की अनदेखी करना आसान नहीं होता है.
                                              हर तरह के अच्छे या बुरे कार्य के विरोध और समर्थन करने वाले दुनिया में हमेशा से ही रहे हैं और जो कार्य किसी के लिए बेहद परेशानी भरा हो सकता है दूसरों के लिए वही गौरव और प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है जो समाज की विविधता में समस्याएं खड़ी करता है. दुनिया भर में राजनेता या शासक अपनी ज़िद या सामाजिक दबावों के कारण बहुत बार विवादित क़दम उठाने से भी नहीं चूकते हैं जिसका समाज पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है पर विविधता से भरे हुए भारतीय समाज जैसे हर समाज के हर वर्ग को यह तो सोचना ही चाहिए कि सामाजिक समरसता केवल एक तरफ़ से ही हमेशा नहीं चलती रह सकती है आज जो सद्भाव की ख़ातिर चुप है तो कल वे भी कड़ा परिरोध कर सकते हैं जो कि अंत में समाज के लिए ही घातक होती है ? समाज की एकतरफ़ा चाल और दूसरों की उपेक्षा कई बार हताशा के साथ प्रतिरोध को भी जन्म दे दिया करती है. मोदी पर कुछ इस तरह के आरोप ही लगाये जाते रहे हैं पर जिन कारणों ने मोदी जैसे लोगों को सामाजिक समरसता ख़त्म होने की इस स्थिति का लाभ उठाने की स्थिति में पहुँचाया है आज उन पर विचार किया ही नहीं जाता है ?
                                            विदेशों में जिस तरह से शासक केवल अपने हितों को ही देखते हैं तो एक दिन जब उन्हें उनके हित मोदी से भी पूरे होते दिखेंगें तो वे उनके स्वागत में पलक पांवड़े बिछाने से नहीं चूकने वाले हैं क्योंकि तब संभवतः उनके पास किसी दूसरे तरह के तर्क मौजूद होंगें अपनी बातों को सही ठहराने के लिए ? राजनीति और नीति में कोई स्थायी शत्रु या मित्र नहीं हुआ करता है और जब आज पूरी दुनिया केवल आर्थिक नीतियों के चक्कर में ही सब कुछ सही ठहराने की तरफ़ जाती हुई दिखाई दे रही है तो उस स्थिति में और क्या किया जा सकता है ? जिन देशों के उद्योग जगत को गुजरात सरकार की नीतियों से भारी आर्थिक लाभ मिलता हुआ दिखा रहा है वे इस मुद्दे पर चुपचाप आज अपनी नीतियां अपने अन्य सूत्रों के माध्यम से बदलने में लगे हुए हैं जिससे आने वाले समय में अचानक ही कोई बड़ा फैसला लेने पर उनकी आलोचना न की जाए ? आर्थिक माहौल में सह अस्तित्व और सामाजिक सद्भाव के साथ किसी नीति पर चलना बहुत मुश्किल होता है और अवसर वादी पश्चिमी देश या उनके पुछल्ले इस तरह के माहौल में जो कुछ भी करते हैं उन पर ज्यादा ध्यान न देते हुए देश को अपने बारे में ही सोचना शुरू करना चाहिए. 
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