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Wednesday, 18 September 2013

दंगे और सच्चाई

                       एक न्यूज़ चैनल द्वारा किये गए स्टिंग ऑपरेशन में जिस तरह से पश्चिमी उ०प्र० के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने इस बात का खुलासा किया है कि उन पर एक वर्ग विशेष के विरुद्ध किसी भी तरह की कार्यवाही न करने का दबाव था उसके बाद से ही सियासी हलकों में हलचल सी मच गयी है. यह सही है कि सपा सरकार में सदैव ही जिस तरह से अधिकारियों के लिए निष्पक्ष होकर काम कर पाना एक कठिन चुनौती से कम नहीं रहा है उस स्थिति में यदि कुछ अधिकारियों ने यह सच बयान किया है तो उससे सपा की दोहरी मानसिकता का ही पता चलता है क्योंकि अभी तक वह न दंगों के लिए संघ और भाजपा को ही दोषी मानती आ रही थी जबकि सच्चाई उससे एकदम उलट ही है. महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा की लम्बी लम्बी बातें करने वाली सपा ने यदि कवल की उस छेड़ छाड़ की घटना के दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की छूट दी होती तो मामला बिगड़ता ही नहीं. अधिकारियों ने जिस तरह से एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही कि एक वर्ग विशेष के विरुद्ध कार्यवाही न करने के कारण ही आम लोगों में गुस्सा पनपा और उसकी परिणिति इतनी घातक हुई जो तुष्टिकरण में लगी हुई सरकार ने सपने में भी नहीं सोचा था ?
                      एक अधिकारी ने यहाँ तक कहा कि आज़म खान का भी उन पर दबाव था तो फिर अब आज़म खान किस मुंह से नाराज़ हो रहे हैं क्योंकि जब माहौल को बिगाड़ने में सभी लोगों ने पूरा सहयोग किया तो अब उसकी इतनी बड़ी प्रतिक्रिया से कैसे बचा जा सकता है ? सपा ने संभवतः सपने में भी नहीं सोचा था कि एक मामूली सा विवाद इतना बड़ा रूप ले लेगा और जिस तरह से अभी तक उसके नेता थानों में जाकर अपनी धमक से रोज़ ही अनैतिक कार्यों को करने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो यह प्रक्रिया आसानी से चलती रहने वाली ही है ? जब किसी एक पक्ष को यह लगने लगता है कि सही होने के बाद भी उसकी बात नहीं सुनी जा रही है तो इस तरह की परिणिति को आखिर कोई भी सरकार कैसे रोक सकती है यह बताने के लिए आज सपा के पास कोई भी उत्तर नहीं है और धार्मिक अल्पसंख्यकों को वास्तविक रूप से आगे बढ़ाने के स्थान पर उन्हें जिस तरह से आर्थिक लाभों का झुनझुना थमाया जाता रहा है अब वे भी उसे सोचने को मजबूर हो गए हैं कि आख़िर उनके साथ क्या किया जा रहा है ?
                   इस स्टिंग ऑपरेशन की सच्चाई कि पूरी जानकारी जनता तक पहुंचनी ही चाहिए जिससे सबके सामने सद्भाव की बातें करने वाले इन नेताओं को बेनकाब किया जा सके क्योंकि जब कोई भी नेता केवल वोटों के लिए समाज में इस हद तक बंटवारा करने की कोशिश कर सकता है कि पूरा सामाजिक ताना बाना ही उधड़ जाये तो अब इन नेताओं से समाज को सचेत होने की आवश्यकता है. आज सपा जिस तरह की हरकतें करने में लगी हुई है और वह खुद ही प्रदेश में उन जगहों पर भाजपा के लिए वोट बढ़ाने का काम कर रही है उससे उसे बहुत बड़ा राजनैतिक नुक्सान तो हो ही चुका है और यदि अभी भी वह निष्पक्ष रूप से अधिकारियों की तैनाती करके माहौल को सुधारने का काम करे तो संभवतः उसके २०१४ के मिशन का कुछ बचा भी रह सके वर्ना उसने जिस तेज़ी से अपनी राजनैतिक ज़मीन भाजपा, बसपा और कांग्रेस के हाथों गंवाई है अब उसके लिए वहां से वापस लौट पाना बहुत ही मुश्किल होने वाला है ? दंगे के परिणामों पर विचार और मंथन एक बार फिर से शुरू है जबकि इन दंगों के लिए ज़िम्मेदार उन लोगों के ख़िलाफ सरकार कुछ करने की हिम्मत आज भी नहीं जुटा पा रही है जिनसे समाज में इतनी बड़ी खाई खुद उसने ही खोदी थी ?     
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