मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 14 November 2013

क्षेत्रीय क्षत्रप और राजनीति

                             देश में चल रहे पांच राज्यों के चुनावों के बीच यदि गौर से देखा जाये तो इन पांच जगहों में हर स्थान पर वहाँ के सीएम पार्टी से बड़ी छवि रखने वाले ही साबित हुए हैं और उनके कामों के दम पर भी तक वे सत्ता में अपनी पार्टी को वापस लाने में भी सफल होते रहे हैं पर इस तरह से इतने प्रभावशाली नेताओं के उदय से क्या आने वाले समय में देश में बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिए संकट दिखायी नहीं देने वाला है क्योंकि किसी भी तरह से इतने मज़बूत स्थानीय नेता के चलते जिस तरह से कई बार केंद्रीय नेतृत्व को उनकी हर बात सिर्फ इसलिए ही सुननी पड़ती है कि वे एक अच्छे और जिताऊ नेता हैं तो उससे आने वाले समय में देश की राजनीति में इन राष्ट्रीय दलों के क्षत्रपों का उदय आखिर किस तरह का संकट सामने ला सकता है ? भाजपा में जिस तरह से इस तरह के नेतृत्व के विकसित होने के बाद राज्यों में केवल व्यक्ति विशेष का ही बोल बाला होने लगा है और भाजपा से बड़े कद में नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान और डॉ रमन सिंह दिखायी देते हैं और वे कई मौकों पर केंद्रीय नेतृत्व को ठेंगा भी दिखा दिया करते हैं ?
                             देश की राजनीति में अच्छा काम करने वाले नेताओं की आवश्यकता सदैव रहेगी क्योंकि आज भी देश में विकास के जो भी आयाम होने चाहिए वे नहीं बन पाये हैं जिससे काम करने वाली संस्कृति को अपनाने वाले व्यक्तियों के लिए यह क्षेत्र सदैव ही खुला ही रहेगा पर इस पूरे मसले में जिस तरह से स्थानीय क्षत्रप मज़बूत होते जा रहे हैं और वे अपने दम पर ही पार्टी को जिताने की क्षमता रखते हैं तो उस स्थिति में कहीं न कहीं से पार्टियां अपने राष्ट्रीय स्वरुप में पिछड़ती ही जा रही हैं क्योंकि भाजपा के सामने कर्नाटक जैसा संकट सिर्फ उसके मज़बूत और प्रभावी नेतृत्व के चलते ही सामने आया था और एक ज़माने में यूपी में भी कांग्रेस ने अपने मज़बूत नेता के रूप में नरेश अग्रवाल के हाथों कई ज़िलों की राजनीति गँवा दी थी जो आज भी उसके लिए एक बुरे सपने जैसा ही है ? कांग्रेस को जोड़ तोड़ और नैतिकता से दूर रहने वाला दल कहने वालों के पास इस बात का कोई जवाब क्यों नहीं होता कि भाजपा जैसी कथित अनुशासित पार्टी भी इस तरह के संकट को क्यों झेलती हैं ? इसके लिए राज्यों के नेताओं की वो महत्वाकांक्षाएं ही अधिक ज़िम्मेदार हैं जो कहीं से भी अपने को ही सब कुछ मान लेती हैं.
                           आज गुजरात में भाजपा से बड़ा कद नरेंद्र मोदी का है और उनके विरोध में कुछ भी कहने की हिम्मत करने वाले कांशी राम राणा, केशु भाई पटेल का क्या हाल हुआ यह देश ने अच्छे से देखा है आज गुजरात में भाजपा से बड़ा नाम मोदी का है और भाजपा को वह नाम इतना बड़ा लगने लगा है कि अब वे पीएम पद के लिए पार्टी के सम्भावित प्रत्याशी भी हैं. ठीक यही हाल एमपी में शिवराज सिंह और छत्तीसगढ़ एमन रमन सिंह का है कि उनके सामने अब राज्य में कोई भी टिकने लायक नेता पूरी पार्टी में नहीं बचा है और यह स्थिति इन राज्यों में पार्टी के लिए सरकार होने जैसी सुखद स्थिति तो बनाती है पर उनके सामने कुछ भी कहने की हिम्मत अब केंद्रीय नेतृत्व भी नहीं कर पाता है जिससे लोकतंत्र का वास्तविक स्वरुप ही बगड़ता नज़र आता है ? कांग्रेस में तो एक परिवार के आस पास राजनीति चल ही रही है और अभी भी वह उससे मुक्त होती नहीं दिखायी देती है पर भाजपा में इस तरह की स्थिति आगे चलकर समस्याएं पैदा कर सकती हैं आंध्र प्रदेश में वाई एस आर रेड्डी के दम पर आसमान पर बैठी कांग्रेस आज किस हालत में है यह सभी देख ही रहे हैं इसलिए इन नेताओं को भी आने वाले समय के लिए पार्टी को तैयार रखना चाहिए और अपनी महत्वकांक्षाओं को भी सीमित करने का प्रयास भी करना चाहिए. 
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