मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 10 December 2013

दिल्ली जनादेश का मतलब

                                       दिल्ली में आये खंडित जनादेश के बीच जिस तरह से सबसे पहले आप और फिर भाजपा ने यह कहकर अटकलों को और भी ज्यादा जन्म दे दिया कि वे सरकार नहीं बनायेंगें और जनता ने उन्हें विपक्ष में बैठने का आदेश दिया है तो वे उसका सम्मान करते हुए वही करेंगें. दिल्ली में जिस तरह से आप ने तीसरी ताकत के रूप में आगे आकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में यही कहानी अन्य राज्यों में भी दोहरायी जा सकती है जहाँ कहीं भी केवल भाजपा और कॉग्रेस आमने सामने हैं. ये दल मजबूरी में जनता द्वारा दिए गए जनादेश को अपने पक्ष में बताकर इस तरह से प्रदर्शित करते हैं जैसे उन पर जनता को बहुत भरोसा हो ? जिन राज्यों में इन दोनों दलों के बीच ही सीधा मुक़ाबला होता है वहाँ पर जनता के पास कोई अन्य विकल्प ही नहीं होता है और दिल्ली में घटिया राजनीति से इतर जनता को राजनीति से जोड़कर आगे बढ़ने वाली आप के आते ही इन दोनों दलों के लिए ख़तरे की घंटी तो बज ही चुकी है क्योंकि अब विकल्पहीनता को विकल्प समझना अब बहुत बड़ी ग़लती साबित होने वाली है.
                                     दिल्ली के नतीज़े में कॉंग्रेस के पास करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है और जिस तरह से बाक़ी दोनों दल पीछे हटते हुए दिखायी दे रहे हैं वे देश में केवल विरोध की राजनीति को भी दर्शाते हैं आप इस मामले में बिलकुल नयी है पर जिस तरह से वह राजनैतिक शुचिता की बातें करती है उससे उसका आगे बढ़कर सरकार बनाने की किसी भी कोशिश का प्रयास न करना समझ में आता है पर भाजपा इस बार ऐसी दुविधा में है कि वह खुद आगे बढ़ना तो चाहती है पर बहुत तेज़ी दिखाने के बाद सरकार का बहुमत कैसे सिद्ध होगा यह उसके लिए भी बड़ा प्रश्न है ? वैसे दिल्ली के नतीज़े पूरी तरह से आप के पक्ष में हैं और आज के समय यदि भाजपा सकारात्मक राजनीति की खोखली बातें करने के स्थान पर उस पर अमल भी करे तो दिल्ली को भले ही अल्पमत की ही सही पर आप की सरकार तो मिल ही सकती है और ऐसा भी नहीं है कि अल्पमत की सरकारें चला नहीं करती हैं पर आप अपनी राजनैतिक पारी की शुरुवात किसी भी तरह की घटिया जोड़ तोड़ से नहीं करना चाहती है यह एक अच्छा संकेत भी है.
                                     वैसे कॉंग्रेस या भाजपा के लिए राजनैतिक रूप से वही स्थिति सुखद होगी कि जिसमें आप सरकार न बना पाये पर आप की मेहनत जब सबके सामने है तो उस स्थिति में उसे ये दल सरकार बनाने का मौका नहीं देना चाहेंगे फिर भी यदि आप की सरकार कॉंग्रेस के अनुपस्थित रहने के कारण चलती रहती है तो सम्भवतः जनता को उनकी नीतियां परखने का मौका भी मिले और उसे वास्तविकता की कसौटी पर कसा भी जा सके ? पर यह स्थिति दोनों बड़े दलों के लिए अनुकूल और प्रतिकूल दोनों तरह का परिणाम लेकर सामने आ सकती है क्योंकि जब भी आप की सरकार जनता तक पहुँचने के लिए किसी भी तरह के प्रचलित आडम्बरों को दूर रखने में सफल होगी तो इन आडम्बरों में जीने वाले नेताओं का क्या होगा और जनता ने यदि आप के काम को पसंद कर लिया या पहली बार उसकी गलतियों को नज़र अंदाज़ करके दोबारा सत्ता उसे सौंप दी तो इन दलों के पास दिल्ली के बाद पड़ोसी राज्यों को सँभालने की बहुत बड़ी चुनौती आ जायेगी और ये उससे बचना ही चाहेंगें ? देश का संविधान सभी को चुनाव लड़ने और देश के लिए काम करने का समान अवसर देता है तो इस बार दिल्ली को कोई समझदार सरकार मिल रही है जो काम करने में यकीन रखे या फिर लोकसभा के साथ दिल्ली एक बार फिर से अपने प्रतिनिधियों और विधान सभा को चुनने की राह पर जाती है यह तो समय ही बतायेगा.
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