मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 18 December 2013

कूटनीतिक सम्बन्ध और अमेरिका

                                        पूरी दुनिया में हर तरह के कूटनीतिक सम्बन्धों को अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करने का अमेरिकी दाँव इस बार लगता है उसे पूरी तरह उल्टा ही पड़ गया है क्योंकि जिस तरह से कूटनैतिक मसलों पर हमेशा से ही भारत का रवैया पूरी दुनिया के साथ बहुत ही नरम रहा करता है उसके उलट इस बार उसका गुस्सा वास्तव में पूरी दुनिया को अचंभित करने वाला ही लग रहा है. भारत ने अपने आज़ादी के बाद से इतने लम्बे कूटनैतिक अनुभव में कभी भी इस तरह की बातों पर इतनी सख्त प्रतिक्रिया कभी भी नहीं दी है और इस मसले को भी सामान्य शिष्टाचार और वियना समझौते के अनुसार ही निपटाने की मंशा बना रखी थी पर अमेरिका ने जिस लापरवाही से पूरे मसले को हलके में लिया उसके बाद यह आशंका जतायी जाने लगी थी कि अब भारत कुछ कड़े कदम उठा सकता है पर क़दमों का स्वरुप ऐसा होगा कि अमेरिका को मिली हुई हर तरह की विशेष सुविधा एक झटके में ही वापस ले ली जायेगी और बहुत सारे कानूनी मसलों पर भी जवाब मांग लिया जायेगा ऐसा तो अमेरिका ने सपने में भी नहीं सोचा था.
                                        जब बात वियना समझौते की आती है तो उसके अनुपालन की ज़िम्मेदारी केवल भारत की ही कैसे बन सकती है क्योंकि वह सभी देशों के लिए मानने लायक समझौता है तो भारत उस पर अमल करता रहे और अमेरिका अपनी सुविधानुसार कुछ भी करता रहे तो इसे आज के युग में कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है ? अभी तक अपनी नियमों के अनुसार चलने के भारतीय संकल्प का अमेरिका ने कुछ गलत अर्थ ही निकाल रखा था तभी दिल्ली में उसके वाणिज्य दूतावास के बाहर अन्य दूतावासों की तरह सामान्य व्यवस्था अपनाये जाते ही अमेरिका ने वियना समझौते का राग अलापना शुरू कर दिया है जबकि उसने देवयानी मामले में इसका सरासर उल्लंघन किया है. महिला और ज़िम्मेदार लोकतंत्र की प्रतिनिधि होने के बाद भी अमेरिकी अधिकारियों ने उनके साथ जैसा बर्ताव किया उस पर भारत की प्रतिक्रिया बिलकुल ही उचित है और अब सम्बन्धों को उसी स्तर तक विशेष बनाये जाने की आवश्यकता है जितना विशेष अमेरिका भारत को मानता है वर्ना दिल्ली में सैकड़ों देशों के वाणिज्य दूतावास भी तो खुले हुए हैं उनको क्या सुविधा दी जा रही है ?
                                        यह सम्भव है कि घरेलू नौकरानी के विवाद में देवयानी की तरफ़ से कुछ ग़लतियाँ भी की गयी हों पर उसके जवाब में अमेरिका भारत से उन्हें वापस बुलाने के लिए भी कह सकता था और साथ ही पीड़ित पक्ष को भारत में ही दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहे मुक़दमे के इंतज़ार करने को कह सकता था पर इसके स्थान पर उसने हमेशा की तरह ही जिस तरह से अपनी थानेदारी निभायी इस बार उसे यह पूरा मामला उल्टा ही पड़ता दिखायी दे रहा है क्योंकि भारत इस मसले पर इतना तीव्र विरोध करेगा यह तो किसी ने भी नहीं सोचा था ? अब मसला अमेरिका के पास है और जब तक वह भारत के साथ सामान्य रिश्तों की बातें बराबरी पर नहीं करता है इस बार भारत की तरफ से कोई ढील नहीं दी जायेगी और भारत ने जिस तरह से दूतावास के सभी कर्मचारियों के बारे में पूरी जानकारी मांगी है तो अब अमेरिका का उसमें कहीं न कहीं फंसना तय है और तब भारत में उसके वाणिज्य दूत के विरुद्ध भारतीय कानून के तहत मुक़दमें दर्ज़ कराकर कार्यवाही करने का रास्ता अब खुलता सा नज़र आ रहा है ? इस विषम परिस्थिति में उलझने के बाद पहली बार अमेरिका को भी यह पता चल जायेगा कि समझौते क्या होते हैं और उनका अनुपालन करना सभी के लिए आवश्यक होता है और किसी को भी इससे छूट नहीं दी जा सकती है.   
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