मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 3 December 2013

शातिर नाबालिग और कानून

                             पिछले वर्ष दिल्ली बस घटना के बाद से जिस तरह से आम जन मानस ने किशोरों के जघन्य अपराधों में शामिल होने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी के कारण बालिग होने की उम्र को कम करने के लिए जिस तरह से मांग की थी लगता है कि अब जाकर केंद्र सरकार ने भी जघन्य अपराधों में शामिल होने वाले १६ वर्ष से ऊपर के नाबालिगों को किशोर न्याय का आवरण न देने का मन बना लिया है. निर्भया मामले में जिस तरह से उसके माता पिता ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है और उस किशोर को भी दण्डित करने की मांग की है और उस पर कोर्ट ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है उससे आने वाले समय में इस तरह के अपराधियों को सही ढंग से सजा दिए जाने में काफी मदद मिलेगी. आज के समय में जब किशोर इस तरह के जघन्य अपराधों में लिप्त होते चले जा रहे हैं तो क्या समाज को केवल आयु निर्धारण में छूट मिल जाने के कारण ही उन्हें देश के सामान्य न्याय से अलग कर देना उचित है ?
                             न्याय तभी सही न्याय लग सकता है जब उसमें इस तरह के किसी छूट देने वाले मसले का प्रावधान न हो पर सामान्य रूप से सामान्य अपराधों की श्रेणी को निर्धारित करते समय किशोरों को सुधार गृह में भेजे जाने की पुरानी व्यवस्था चलती रहनी चाहिए पर किसी भी ऐसे अपराध में जिसमें किसी लड़की या महिला के साथ बलात्कार और उससे भी बढ़कर हैवानियत की सारी हदें पार कर दी गयीं हो और वह किशोर भी उसमें शामिल ही रहा हो तो उसे किसी भी तरह का कानूनी संरक्षण किसी भी परिस्थिति में देना नैसर्गिक न्याय के विपरीत ही होगा. अच्छा ही है कि इस मामले में केंद्र भी उसी तरह से सोचना शुरू कर चूका है और इस घटना के एक वर्ष पूरा होने पर सरकार भी चाहेगी कि चुनावी वर्ष होने के कारण ऐसा कुछ किया जा सके जिससे वो भी महिलाओं की सुरक्षा के मामले में अपने को सबसे आगे खड़ा कर सके. देश के कानून में जो भी सम्भव हो बदलाव किये जाने चाहिए जिससे आने वाले समय में इस किशोर श्रेणी के अपराधियों को किसी भी तरह के कानून से संरक्षित न किया जा सके.
                            इन सभी कानूनी पचड़ों के बीच के बात जो सबसे महत्वपूर्ण बनकर सबके सामने आती है कि आख़िर आज हमारे समाज को  क्या होता जा रहा है जिसमें हम अपने बच्चों को वे सामाजिक मूल्य और परम्पराएं विरासत में नहीं दे पा रहे हैं जिसके वे हक़दार हैं ? क्या कारण है कि देश में इस तरह से बाल और किशोर अपराधियों की संख्या में बढ़ोत्तरी दिखायी देने लगी है और हम एक समाज के रूप में पूरी तरह से विफल होते जा रहे हैं ? जिन मूल्यों और परम्पराओं को अपनी अगली पीढ़ी तक सहेज कर बढ़ाने का दायित्व हम पर ही है आख़िर हम उसमें इस तरह से कैसे फेल हो रहे हैं ? सामाजिक व्यवस्था के लिए नए-नए और कड़े कानून भी सभ्य समाज में बहुत आवश्यक है पर साथ ही इन बच्चों को हैवान बनने से रोकने के लिए जिन व्यवस्थाओं को बनाये रखना हमारी ज़िम्मेदारी है वह भी तो कहीं से पूरी होनी ही चाहिए ? कानून समाज के अपराधियों को दंड देने के लिए ही होते हैं उनसे अपराधियों की संख्या में कोई कमी नहीं आती है पर समाज में सुधारात्मक क़दमों से जो वैचारिक परिवर्तन आ सकता है उसके लिए हम सभी को निरंतर ही प्रयासरत रहना ही चाहिए.  
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