मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 23 February 2014

यूपी की लालबत्तियां और कोर्ट

                                                सुप्रीम कोर्ट में १८ जुलाई २००७ के आदेश पर कोई राहत न मिलने के कारण अब यूपी सरकार के पास अपने चहेतों के लिए लाल बत्तियों का जुगाड़ कर पाना और भी मुश्किल भरा काम होने वाला है क्योंकि कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है जिसमें नगर निगमों, निकायों और बोर्ड के अध्यक्षों / उपाध्यक्षों के लिए सरकार ने इस तरह से विशिष्ट जन की परिभाषा गढ़ने के बाद उन्हें यह लाभ दिया था. मोटर वेहिकल एक्ट नियम १०८ के उपबंध ३ में सरकार को यह अधिकार दिए गए हैं कि वह विशिष्ट जन को इस सेवा के उपयोग के लिए आदेश जारी कर देती है जबकि कोर्ट का कहना था कि इस तरह से जारी किया गया कोई भी शासनादेश किसी को भी लाल बत्ती के उपयोग के लिए अधिकृत नहीं कर कर सकता है इसलिए वह आदेश ही पूरी तरह से अवैध है और अब मामला एक बार फिर से हाई कोर्ट में आने से सरकार उसकी सुनवाई से पहले ही अपनी किरकिरी बचने के लिए अब शासनादेश को ही वापस लेने पर विचार कर रही है.
                                                 सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से यूपी सरकार से यह सवाल ही पूछ लिया कि यह विशिष्ट जन शब्द कहाँ से आया क्योंकि संविधान में इसका कोई ज़िक्र नहीं है तो सरकार के पास कोई उत्तर नहीं था क्योंकि एमवी एक्ट में उसने अपने स्तर से यह शब्द नियमों में जोड़ा है जिसका कोई संवैधानिक महत्व नहीं है और सरकार किसी भी तरह से इसको कोर्ट के सामने बचा नहीं सकती थी इसलिए अब उसके स्तर पर यह प्रयास शुरू किये जा चुके हैं कि इस समस्या से आराम से निपटा जाये और कोर्ट में सरकार के सामने कोई विपरीत परिस्थिति न आने पाये. यहाँ पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता कि आखिर सरकारें इस तरह की कार्यवाही करने से पहले विधि मंत्रालय की राय क्यों नहीं लेती हैं जिससे उनके किसी भी इस तरह से लुभाने वाले आदेश को देने में कोई कानूनी अड़चन न रहे ? आज जब हर तरफ ही इन बातों को लेकर समस्या बढ़ती ही जा रही है फिर भी सरकारों के इस तरह के सामान्य कार्यों में भी कानून को ताक पर रखने से बाज़ नहीं आ रही हैं ?
                                                 जब देश की विधायिका ही इस तरह से नियमविरुद्ध कार्यों में लगी हुई है तो आखिर उसको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है आज इस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि एमवी एक्ट में राज्यों में गाड़ियों का पंजीकरण तो होगा पर नियम पूरे देश में एक जैसे ही रहें तो इसके लिए क्या केंद्र सरकार को अपने स्तर से पहल नहीं करनी चाहिए ? आज हर राज्य में अलग तरह की व्यवस्था किये जाने से आवागमन पर राज्यों के लोगों और पुलिस के लिए अलग अलग नियम व अधिकार होने से समस्या ही होती रहती है जिसका अब विकसित होते देश में कोई स्थान नहीं होना चाहिए क्योंकि जब भी देश को इस तरह से राज्यों के आधार पर नियमों का निर्धारण और बंटवारा होता है तो उससे पूरे देश में विकास और औद्योगिक स्तर पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ने लगता है पर हमारे देश में जिस तरह से राज्य अपने इन कथित खोखले और व्यर्थ के अधिकारों के लिए चिल्लाना शुरू कर दिया करते हैं उससे क्या देश को आगे बढ़ने में कोई मदद मिलती है ? राजस्व संग्रह में राज्यों और केंद्रीय स्तर पर स्पष्ट बंटवारा और नियमों को सही तरह से बनाने की दिशा में अब सोचने का समय आ चुका है और इससे बचकर विकास के आयामों को गढ़ने में असफल रहने पर पीछे ही रहने वाले हैं.     
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