मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 7 February 2014

प्रीमियम ट्रेन और भारतीय रेल

                                               मुम्बई दिल्ली विशेष प्रीमियम ट्रेन की सफलता से उत्साहित रेल मंत्रालय ने इस बार की लेखानुदान मांगों में जिस तरह से इस दिशा में और आगे बढ़ने की सोच पर काम करना शुरू का दिया है उससे जहाँ यात्रियों को अंतिम समय में ट्रेन की यात्रा के लिए टिकट और स्थान उपलब्ध होने की सम्भावनाएं बढ़ जाएंगीं वहीं रेलवे की आमदनी में भी वृद्धि होने की पूरी सम्भावना है. अभी तक प्रायोगिक तौर पर चल रही मुम्बई दिल्ली विशेष राजधानी ट्रेन द्वारा रेलवे को अपनी सामान्य राजधानी से ४०% अधिक कमाई देने के बाद से ही रेलवे अधिकारियों का ध्यान इस तरफ गया है कि यदि इस सुविधा को देश के अन्य बड़े शहरों तक भी बढ़ाया जाये तो रेलवे एक तरफ जहाँ यात्रियों को अधिक सुविधा दे सकेगी वहीं दूसरी तरफ अपने घाटे को भी कम करने में सफल हो सकेगी. देश में अब रेलवे को इस तरह के नए प्रयोगों पर विचार करने बहुत आवश्यकता है क्योंकि जब तक नए सिरे से आज की आवश्यकतों के अनुसार सुविधाएँ नहीं दी जाएंगीं तब तक स्थितियां नियंत्रण के बाहर ही रहने वाली हैं.
                                             प्रीमियम ट्रेन के किराये का निर्धारण हवाई यात्रा की तर्ज़ पर किया गया है जिसमें जितनी जल्दी टिकट बुक कराया जाता है उतना ही सस्ता टिकट यात्रियों को मिल जाता है इससे जहाँ रेलवे को काफी पहले से धन मिल जाता है और गाड़ी जाने का समय निकट आने के साथ ही टिकट भी मंहगा होता जाता है जिससे अंतिम समय में यात्रा करने वालों के लिए एक विकल्प तो उपलब्ध होता ही है साथ ही उससे यात्रियों के लिए भी आसानी हो जाती है. इस पूरी कवायद में जहाँ दलालों से यात्रियों का पीछा छूट जाता है वहीं रेलवे की जेब में वो भ्रष्टाचार की कमाई भी आ जाती है जो कुछ कर्मचारियों और दलों के माध्यम से रेलवे को नुकसान किया करती थी. अभी तक अंतिम समय में यात्रा करने वालों के लिए तत्काल के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था पर उसमें भी जितनी तेज़ी से टिकट बुक होते हैं तो आम लोगों के लिए वहाँ पर अधिक सुविधा नहीं मिल पाती है पर इस तरह के नए टिकट तंत्र और इन विशेष ट्रेनों में जहाँ स्थान भी मिलने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं वहीं आमदनी पर भी अच्छा असर पड़ता है.
                                               यह सही है कि इस तरह की ट्रेनों की संख्या बढ़ाये जाने पर राजनैतिक दल भी कुछ हद तक हो हल्ला कर सकते हैं पर जब अन्य कोई विकल्प ही शेष नहीं हैं तो इस तरह के कुछ उपायों को शुरू करने के अलावा और क्या विकल्प रेलवे के पास शेष बचे हैं ? दिल्ली मुम्बई मार्ग पर जिस तरह से यात्रियों ने इस सेवा को हाथों हाथ लिया है वह भी रेलवे के लिए सुकून भरी खबर ही है क्योंकि यदि यह प्रयोग असफल होता तो रेलवे लम्बे समय तक ऐसा कुछ भी सोच भी नहीं पाती और राजनैतिक रूप से उस पर और दबाव भी बनाया जाने लगता कि ऐसे प्रयोगों की कोई आवश्यकता ही नहीं है. आज रेलवे को नए तरह के प्रीमियम कोचों पर विचार करना चाहिए जिसमें एक ही कोच में सभी दरजों की वातानुकूलित सीटों के साथ कुछ स्लीपर की भी व्यवस्था हो और आवश्यकता पड़ने पर इन्हें किसी भी मार्ग की ट्रेन में लगाया जा सके जिससे पूरी ट्रेन के सञ्चालन का खर्च भी बचेगा और लगभग हर ट्रेन में आने वाले समय में कम लागत में ही प्रीमियम सेवा उपलब्ध हो जायेगी. रेलवे को अब अपने परिचालन में इस तरह का लचीला रुख अपनाना ही होगा क्योंकि इसके बिना अब आर्थिक रूप से केवल माल भाड़े पर निर्भर रहकर रेलवे को बचाया नहीं जा सकता है.            
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