मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 21 May 2014

कांग्रेस संसदीय दल और नेता

                                                   आम चुनावों में जनता से जुड़े मुद्दों पर केवल बयानबाज़ी तक ही सीमित रही कांग्रेस के पास अब भाजपा और एनडीए के प्रचंड बहुमत के बाद सदन में करने के लिए क्या कुछ शेष रह जाता है यह सोचना वैसे तो उसके नेतृत्व पर ही निर्भर करता है पर जिस तरह से विभिन्न राज्यों में कांग्रेस धीरे धीरे कमज़ोर होती चली जा रही है उस पर विचार करने के लिए अब पार्टी को सधे और प्रभावी कदम उठाने ही होंगें. कानूनी बाध्यताओं के चलते भले ही कांग्रेस को आधिकारिक विरोधी दल का दर्ज़ा न मिल पाये पर अब उसे अपनी विश्वसनीयता को बचाये रखने के लिए सदन में अपनी सीमित संख्या के साथ सकारात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करना ही होगा. जब सत्ताधारी दल के पास सदन में इतना स्पष्ट बहुमत हो तो विपक्ष की भूमिका पर भी सभी की नज़रें रहा करती हैं क्योंकि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार अपनी पूरी ऊर्जा को सही दिशा में खर्च करने के लिए स्वतंत्र और तत्पर रहा करती हैं.
                                                  अभी तक जिस तरह से परिस्थितियां सामने आ रही हैं तो उसमें कांग्रेस संसदीय बोर्ड के नेता का पद संभवतः सोनिया के पास ही रहने वाला है और अपनी सुविधा के लिए सोनिया लोकसभा में किसी और को इस पद के लिए नामित कर सकती हैं वहीं राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका डॉ मनमोहन सिंह के पास ही रहने का अनुमान लगाया जा रहा है. अब यहाँ पर यह बात अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है कि यदि सोनिया अब अपने को सीधे लोकसभा में नेता पद से दूर रखती हैं तो उनके पास क्या विकल्प शेष रहने वाले हैं ? जिस तरह से कांग्रेस ने राहुल की अगुवाई में चुनाव लड़ा है तो पार्टी को जितनी भी सीटें मिली हैं उस स्थिति में उन्हें ही लोकसभा में संसदीय दल का नेता बनाया जाना चाहिए क्योंकि यदि आने वाले समय में पार्टी उनके लिए कोई बड़ी भूमिका निर्धारित करने वाली है तो अब समय आ गया है कि उन्हें भी सदन कि बैठकों को प्राथमिकता देने और विधायी कार्यों को समझने के पूरे अवसर भी देने चाहिए. सदन में सत्ता को नज़दीक से विरोधी खेमे में बैठकर उन्हें अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं और सत्ता पक्ष से सीखने को बहुत कुछ मिल सकता है और यदि वे विधायी कार्यों में अपनी संलिप्तता बढ़ाते हैं तो यह फिलहाल उनके और पार्टी के साथ आने वाले समय में देश के लिए भी अच्छा साबित हो सकता है.
                                                     राहुल ने पिछले कुछ समय से जिस तरह से पार्टी के कामों को ही प्राथमिकता दी हैं उस स्थिति में अब उनसे यह आशा भी की जानी चाहिए कि वे अब एक मज़बूत सरकार के विरुद्ध सदन में अपनी पार्टी का नेतृत्व खुद ही करें जिससे उनको संसदीय परम्पराओं के साथ दांवपेंचों की भी जानकारी सही तरह से हो सके. विपक्ष में बैठकर उन्हें सीखने के अवसर अधिक मिलेंगे क्योंकि अब सत्ता के चाटुकार उनसे दूर ही रहने वाले हैं तथा उनकी मदद के लिए सदन में कमल नाथ और सदन के बाहर राजसभा सदस्य प्रमोद तिवारी जैसे विधायी कार्यों के कुशल लोगों को सहयोग के लिए भी लगाया जा सकता है. यदि कांग्रेस राहुल को भविष्य की ज़िम्मेदरियों के लिए तैयार करना ही चाहती है तो संभवतः उसके पास इससे अच्छा समय आने वाला नहीं है क्योंकि यदि इस समय राहुल ने यह समय गँवा दिया तो उनके लिए सीखने का यह दौर जल्द ही खत्म भी हो सकता है. यदि पार्टी उनमें अपना भविष्य देखती है तो उन्हें भी अपने को खुद हर तरह की कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार करने के साथ आगे बढ़कर नरेंद्र मोदी की सरकार के साथ देश के रचनात्मक माहौल को सुधारने के लिए काम करना ही पड़ेगा. राहुल को अब एक मज़बूत सरकार की नीतियों की गुणदोष के आधार पर सहयोग या विरोध करने के लिए खुद को झोंकना ही होगा और केवल सत्ता मिलने के समय मिलने वाले लाभों को उठाने वाले प्रयासों से दूरी बनानी ही होगी. 
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