मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 30 May 2014

हिंदी पत्रकारिता का विकास

                                                               ३० मई १८२६ को जब हिंदी के पहले पत्र उदंड मार्तण्ड का प्रकाशन हुआ था तब से आज तक प्रकाशन और अन्य क्षेत्रों से आगे निकलते हुए हिंदी पत्रकारिता बहुत आगे तक जा पहुंची है. आज का दिन भारतीय राष्ट्र भाषा और मुख्य रूप से बोली और समझी जाने वाली भाषा के तौर पर हिंदी ने बहुत कुछ पा भी लिया है. पत्रकारिता के क्षेत्र में जब अंग्रेज़ों के आधिपत्य और केवल कहने भर के मुगलों के शासन काल में भी जिस तरह से हिन्दी ने अपने लिए यह कोशिश करने का प्रयास किया था आज वह अकल्पनीय और अविश्वसनीय भी लगता है फिर भी उन लोगों को बहुत धन्यवाद दिया जाने चाहिए जिनके मष्तिष्क में सबसे पहले यह बात आई कि हिंदी में भी कोई पत्र निकाला जाना चाहिए. यहाँ यह भी ध्यान रखना होगा कि उस समय छापेखाने के लिए मूलभूत सुविधाएँ जुटाना कितना बड़ा काम था क्योंकि परंपरागत छापेख़ानों से कुछ भी छापना कितना दुष्कर हुआ करता था फिर भी उन लोगों को दृढ इच्छाशक्ति ने पूरे काम को इतिहास में अंकित कराने में पूरी सफलता प्राप्त की.
                                                              हिंदी पत्रकारिता को इतिहास में स्थान दिलाने का श्रेय कानपूर के मूल निवासी और तब कलकत्ता में निवास कर रहे एक वकील जुगल किशोर शुक्ल ने अपने दम पर किया था १६ फरवरी १९२६ को उन्होंने हिंदी के इस पत्र को प्रकाशित करने का लाइसेंस भी अपने सहयोगी मुन्नू ठाकुर के साथ पाने में सफलता पायी थी जिसके बाद उसके प्रकाशन के लिए उन्हें इतने महीने का इंतज़ार करना पड़ा था. पहली बार साप्ताहिक रूप में छपे इस पत्र में खड़ी बोली और ब्रज भाषा का समावेश किया गया था तथा प्रारंभिक रूप में इसकी केवल ५०० प्रतियां ही छपना शुरू हुई थीं पर इसके पाठक कलकत्ता से बहुत दूर होने के कारण इसको लम्बे समय तक चलाया नहीं जा सका क्योंकि उस समय कलकत्ता में हिंदी भाषियों की संख्या बहुत काम हुआ करती थी और डाक द्वारा भेजे जाने वाले इस पत्र के खर्चे इतने बढ़ गए कि इसे अंग्रेज़ों के शासन में चला पाना बहुत कठिन हो गया और ३७ अमरतल्ला लेन, कालूटोला, बड़ा बाज़ार से शुरू होने वाले इस प्रयास को ४ दिसम्बर १९२८ रोकना पड़ गया.
                                                        भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए पहली बार पूरे मन से कार्यरत गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक के हटने के बाद भारतीय भाषाओं को मिलने वाली सुविधाओं में कमी और डाक खर्चे में बढ़ोतरी भी इस पत्र के प्रकाशन को रोकने में बहुत बड़ा कारण बनती हुई दिखाई दी थी. महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जुगल किशोर शुक्ल ने अपने प्रयासों को पूरी तरह से बंद नहीं किया और १८५० में उन्होंने समदंड मार्तण्ड नाम से एक पत्रिका निकालनी फिर से शुरू की जो लगातार १९२९ तक छपती रही. भारतीय पत्रकारिता में एक इतिहास की तरफ बढ़ते हुए कदम ने आज कितनी बड़ी सफलता पा ली है और सिनेमा तथा टीवी ने अपनी वैश्विक पहुँच से हिंदी भाषा के प्रति दुनिया को अपने आप जागरूक करना शुरू कर दिया है. आज विश्व के बहुत सारे देशों में बसने वाले भारतीय मूल के लोगों के साथ हिंदी ने दुनिया के कई देशों में अपनी पहचान बनाने में सफलता भी पायी है. उदंड मार्तण्ड के रूप में जो सपना पहली बार भारत में देखा गया था वह अपने आप ही इतना बड़ा और प्रभावशाली हो जायेगा तथा भाषा के प्रचार में इतना योगदान दे सकेगा यह किसी ने सोचा भी नहीं होगा.     
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