मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 30 July 2014

मेल/एक्सप्रेस- पूरी एसी ?

                                                             भारतीय रेल के दक्षिण रेलवे द्वारा मंगला एक्सप्रेस के शयनशान श्रेणी के डिब्बे को हटाकर उसकी जगह एसी डिब्बा लगाने के बाद देश में एक बार फिर से यह सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि आने वाले समय में रेलवे शयनयान श्रेणी को ख़त्म ही कर सकता है. दक्षिण रेलवे के प्रवक्ता द्वारा भी जिस तरह से इस बात का समर्थन किया गया उससे इन आशंकाओं को भी बल मिला और मामला यहाँ तक पहुंचा कि रेलवे को अपने ट्विटर हैंडल पर इस बात का स्पष्टीकरण भी देना पड़ गया कि उसकी ऐसी कोई योजना नहीं है. भारतीय परिस्थितियों में जहाँ लोगों के लिए रेलगाड़ियों में जगह पाना भी एक संघर्ष से कम नहीं है वहां पर किसी भी महत्वपूर्ण ट्रेन में इस तरह के परिवर्तन करने से आखिर किसके हितों को पूरा किया जा सकता है ? निश्चित तौर पर लम्बे समय में इसे यात्रियों के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है और इसका दुष्प्रभाव पड़ने से गाड़ियों में भीड़ बढ़ने और टिकटों के लिए और भी मारामारी होने की सम्भावना भी बढ़ती ही जा रही है.
                                                             इस पूरी कवायद रेलवे को कहने के लिए आमदनी बढ़ाने में सफलता मिल जाएगी क्योंकि यदि पूरी ट्रेन की संरचना बदल जाती है तो उसकी आमदनी में लगभग ढाई गुना का बदलाव हो जायेगा जिससे कम से कम दस डिब्बों से मिलने वाली आय पूरी ट्रेन की संरचना पर ही असर डालने लगेगी. आज भी इस तरह से सोचने से देश में काम नहीं चलने वाला है. यदि रेलवे कुछ विशेष मार्गों पर अलग से केवल एसी गाड़ियों के सञ्चालन पर ध्यान देना शुरू कर दे तो उससे बड़ा अंतर आ सकता है क्योंकि इससे जिन यात्रियों को इस श्रेणी में यात्रा करनी है उनके लिए भी आसानी हो जायेगी और साथ ही रेलवे को भी महत्वपूर्ण आय अर्जित करने में सफलता मिल सकती है. पर साथ ही इस तरह से आगे पीछे चलने वाले गाड़ियों के संयोजन में बदलाव करने से पहले रेलवे को इन गाड़ियों के पहले एक शयनयान श्रेणी की गाड़ी ही चलाये जाने पर विचार करना ही होगा क्योंकि केवल एक श्रेणी पर ही सदैव ध्यान नहीं दिया जा सकता है.
                                                             आज भी देश के ५०० से ७०० किमी की दूरी पर स्थिति शहरों के लिए एसी ट्रेन चलाये जाने की प्रक्रिया का अनुपालन शुरू किया जा चुका है पर उस योजना में इस तरह से किसी ट्रेन की वर्तमान स्थापित संरचना से अलग हटकर कुछ भी नहीं किया गया और जहाँ तक संभव हो सका है एक नयी ट्रेन ही चलायी गयी है जिससे लोगों को रेलवे की सीट क्षमता में वास्तविक वृद्धि का लाभ भी मिला है. आज यदि रेलवे को अपनी गाड़ियों की क्षमता में वृद्धि करनी है तो उसे हर महत्वपूर्ण गाड़ी में सामान्य और एसी श्रेणी के कुर्सी यान लगाये जाने को प्रायोगिक तौर पर प्राथमिकता देनी ही होगी क्योंकि उनसे कम संसाधन के साथ जहाँ एक तरफ अधिक क्षमता से यात्रियों की कुल संख्या को बढ़ाया जा सकेगा वहीं रेलवे की आमदनी को वास्तविक रूप में बढ़ाने में भी सफलता मिल जाएगी. यदि रेलवे वास्तव में ट्रेनों के वर्तमान स्वरुप में कोई बड़ा परिवर्तन करने के बारे में सोच रही है तो यह आने वाले दिनों में सामन्य श्रेणी में यात्रा करने वालों के लिए एक बुरी खबर ही हो सकती है.         
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