मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 9 July 2014

भारतीय रेल और चुनौतियाँ

                                                              इस बार के रेल बजट में बुलेट ट्रैन को छोड़कर कोई भी बहुत बड़ी परियोजना की घोषणा न होने से जहाँ रेलवे के लिए अपनी मज़बूती पर ध्यान केंद्रित किये जाने को बल मिल सकेगा वहीं मंडल के अनुसार रेल के सफर और सुविधाओं पर ध्यान न देने के कारण ट्रेनों के लेट चलने की दुर्व्यवस्था पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा. भारत में तीव्र गति की ट्रेन एक विशेष वर्ग की आवश्यकता तो हैं पर इसे आम लोगों को कितना लाभ पहुँच पायेगा यह अभी भी किसी को नहीं पता है. रेलवे में मंत्री और सरकार के करने के लिए बहुत कुछ नहीं होता है और संभवतः इस बार भी रेलवे बोर्ड ने अपनी मनमानी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है क्योंकि पीएम की बुलेट ट्रेन और रेल विश्वविद्यालय को छोड़कर कुछ भी ऐसा नहीं कहा गया है जिसमें कुछ बहुत ख़ास हो फिर भी केवल इन दो परियोजनाओं को शामिल कर बोर्ड ने बाकी मसलों को एक बार फिर से पीछे धकेलने में सफलता पायी है.
                                                 रेलवे के सामने आज की सबसे बड़ी चुनौती अपने उस तंत्र को सुधारने की है जिसमें उसे सामान्य यात्रियों के लिए कुछ सुविधाएँ जोड़ने और उसे बेहतर करने की बात है. आज भी छोटी दूरी की गाड़ियों में जिस तरह से भीड़ रहा करती है और उसके बाद भी इन गाड़ियों में बहुत काम संख्या में डिब्बे लगाये जाते हैं उससे रेलवे क्या दिखाना चाहता है यह बात समझ से परे है. किसी भी बड़े शहर से आसपास जाने वाली सवारी गाड़ियों की हालत और डिब्बों की संख्या को मांग के अनुरूप नहीं किया जा सका है जबकि इसमें विकास की बहुत संभावनाएं भी हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार जिस तरह से एसी में सफर करने वालों की संख्या में गिरावट दर्ज़ की जा रही है वह अपने आप में रेलवे के लिए बहुत ही चिंता का विषय है क्योंकि जिन क्षेत्रों से वह आमदनी बढ़ने की आस लगाये है वहां यात्रियों की सख्या में कमी आ रही है ?
                                               बड़े स्तर पर खुद पीएम की दिलचस्पी और नाममात्र के मंत्री होने से जहाँ काम आसानी से होते रहेंगें वहीं निचले स्तर पर आमूल-चूल बदलाव के लिए रेलवे को सोचना ही होगा. पिछले कुछ वर्षों से रेलवे ने जिस तरह से मांग के अनुरूप गाड़ियों में डिब्बों की संख्या पीक सीजन में बढ़ाने की नीति पर काम करना शुरू किया है उससे रेल की आमदनी तो बढ़ी ही है और साथ ही यात्रियों को भी आसानी होने लगी है. रेलवे को अपने कोटे के बारे में भी फिर से सोचने और बदलाव करने की आवश्यकता है क्योंकि आज भी उच्च श्रेणियों में इसी कोटे के कारण सीटें खाली रह जाती हैं और कर्मचारियों के भ्रष्टाचार से रेलवे को घाटा होता रहता है. लम्बी दूरी की गाड़ियों में सामान्य और एसी कुर्सी यान लगाये जाने को एक नीति के रूप में लिया जाना चाहिए क्योंकि इससे यात्रियों को कुछ आराम से यात्रा करने का सुख भी मिल सकेगा और रेलवे को अधिक संसाधन भी नहीं चाहिए होंगें.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment