मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 24 August 2014

सोशल मीडिया, बच्चे और पुलिस

                                                               देश में अपने तरह की अनूठी पहल करते हुए गुडगाँव पुलिस ने विद्यालयों की १२ वीं कक्षा तक एक बच्चों पर सोशल मीडिया के पड़ते हुए दुष्प्रभाव को रोकने के लिए उनके खातों को बंद करने की शुरुवात की है. इस तरह की पहल के पीछे गुडगाँव पुलिस द्वारा कराया गया एक सर्वे है जिसमें यह बात सामने आई थी कि सोशल मीडिया पर एक्टिव मेधावी बच्चों के मार्क्स अन्य बच्चों की तुलना में १५ से २० % तक काम आ रहे हैं जिसके बाद पुलिस ने इस सर्वे को स्कूलों के साथ साझा किया और शहर के २३ स्कूलों की सहमति से यह अभियान १८ अगस्त से शुरू किया जिसके व्यापक परिणाम सामने आते दिख रहे हैं और केवल ६ दिनों में ही १२०० से अधिक बच्चों के खाते बंद किये जा चुके हैं. सर्वे में जब पुलिस ने छह स्कूलों के लगभग १००० बच्चों को भी शामिल किया था जिससे उन पर सोशल मीडिया के इस दुष्प्रभाव का सही तरह से आंकलन भी किया जा सके और उनको भविष्य के लिए सचेत करते हुए सुरक्षित भी किया जा सके.
                                                                आम तौर पर देश में अभी ऐसा कोई कानून नहीं है जिसमें पुलिस इस तरह से किसी अन्य व्यक्ति का खाता बंद कराने के अधिकारों से लैस हो पर सोशल मीडिया के व्यापक दुष्प्रभाव को देखते हुए शहर के बड़े स्कूलों ने इस अभियान को अपना पूरा समर्थन भी दे दिया और इसी बहाने एक बार फिर से अपने यहाँ के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर करने की कवायद शुरू कर दी. कम उम्र में बच्चों के सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के दुष्प्रभावों से अवगत अभिभावकों के लिए भी यह अभियान एक वरदान की तरह सामने आया है क्योंकि अभी तक वे लाख कोशिशों के बाद भी अपने बच्चों को इससे दूर नहीं रख पा रहे थे. अब स्कूलों द्वारा व्यापक सख्ती और कड़ी चेतावनी के बाद उनके लिए बच्चों पर दबाव बनाना आसान भी हो गया है जिससे इसके सकारत्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं. आखिर हमारे समाज में ऐसी कमी क्यों आ रही है कि जो काम परिवार के ज़िम्मे होना चाहिए उसे भी पुलिस और स्कूल मिलकर दबाव के साथ पूरा करने की तरफ बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं ?
                                                         आज जिस तरह से हमारे परिवेश में अभिभावकों के पास अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं बचा है तो उस परिस्थिति में घरों पर उपलब्ध हर तरह की सुविधा का बच्चे उपयोग या दुरूपयोग कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हो चुके हैं. इस सामाजिक कमी के कारण ही बच्चे कई बार ऐसे अपराधियों के चंगुल में उलझ जाते हैं जिनके बेहद खतरनाक परिणाम सामने आते हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया को उपयोग में लाने के कड़े नियमों का अनुपालन किया जाना चाहिए और वहां पर छद्म नाम से कुछ भी पोस्ट करने वालों के लिए रास्ते बंद करने की तरफ भी बढ़ना चाहिए. हमारे बच्चे आज की आधुनिक दुनिया के बारे में सब कुछ जाने इसकी आवश्यकता तो है पर क्या इस आवश्यकता को हम अपने बच्चों को उस संभावित खतरे के समक्ष खुला छोड़ कर पूरा करने के लिए तैयार हैं ? यदि नहीं तो अब गुड़गांव की इस पहल का स्वागत करते हुए पूरे देश में इस तरह की पहल शुरू की जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में हमारे बच्चे इस मंच का उपयोग तभी करना शुरू कर पाएं जब उन्हें इसकी बुराइयों के बारे में भी पता चल जाये.        
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