मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 7 August 2014

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन

                                                                           केंद्रीय मंत्रिमंडल की तरफ से गंभीर श्रेणी के अपराध करने के बाद बच निकलने वाले बाल अपराधियों पर नियंत्रण और उन्हें मामले की गंभीरता के अनुसार दंड दिए जाने के संशोधन प्रस्ताव को मंज़ूरी देने के बाद अब देश में इस कानून के दुरूपयोग की संभावनाओं पर विराम लगाया जा सकेगा. दिल्ली के निर्भया कांड के बाद जिस तरह से रेप को लेकर पूरे देश में आक्रोश फैला था उसके बाद केंद्र सरकार को इस तरह के जघन्य अपराध के लिए मृत्युदंड तक का प्रावधान करना पड़ा और आज भी जिस तरह से महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराधों में किशोरों की संलिप्तता लगातार ही पायी जा रही है तो इस मुद्दे पर भी विचार किये जाने की बहुत आवश्यकता थी. सरकार ने पहले भी किशोर अपराधियों के लिए सामान्य अदालत में मुक़दमा चलाने के प्रस्ताव पर विचार किया था पर बल अधिकारों के लिए काम करने वालों से कोई आम सहमति न बन पाने के कारण इसे छोड़ दिया गया था.
                                                                     अब सहमति के मुख्य बिंदु के स्पष्ट होने के साथ ही यह भी आसानी से निर्धारित किया जा सकेगा कि किशोर अपराधी के खिलाफ कहाँ पर मुक़दमा चलाया जाये क्योंकि सरकार अब इस मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को ही यह अधिकार देने जा रही है कि आवश्यकता पड़ने पर वह ही इस बात का निर्धारण करे कि किसी बाल अपराधी पर मुक़दमा इस एक्ट के तहत चलाया जाये या फिर उसे सामान्य अदालतों में भेजा जाये. अभी तक जिस तरह से बहुत ही गंभीर मामलों में बाल अपराधियों के लिप्त होने के बाद भी उन पर सामान्य तरह से मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता है. अब इस संशोधन से इस पर भी रोक लगा जाएगी पर बोर्ड के काम काज को और भी स्पष्ट और पारदर्शी बनाने की दिशा में भी काम करने की आवश्यकता भी होगी क्योंकि जब अस्पष्ट रूप से कोई अधिकार दिए जाते हैं तो उनका दुरूपयोग करने की संभावनाएं भी बढ़ ही जाती हैं. इसलिए इस संशोधन में सरकार को इस बात का भी पूरा प्रबंध करने की तरफ भी बढ़ना ही चाहिए.
                                        भारतीय कानूनों में इस तरह की कमियों का लाभ जम्मू कश्मीर में अलगाव वादियों द्वारा भी उठाये जाने की सूचनाएँ सामने आती रही हैं. भारतीय कानून के अनुसार इस तरह की गतिविधियों में शामिल युवाओं पर आयु के आधार पर अभी तक सामान्य अदालतों में मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता है जिससे पकडे जाने और अपराध सिद्द उनको अधिकतम तीन वर्षों की कैद ही दी जा सकती है. अब इस नए संशोधन से इस नए मार्ग से पुलिस प्रशासन पर हमले करने और उपद्रव करने वाले किसी भी युवक या युवकों के समूह पर सामान्य अदालत में भी मुक़दमा चलाया जा सकने की स्थिति बनने वाली है. भारतीय कानून में आज भी बहुत सारी ऐसी धाराएं शामिल है जिनका आज के परिप्रेक्ष्य में कोई उपयोग ही नहीं है इसलिए व्यापक पुलिस सुधारों के साथ कानून को आज के अनुरूप किये जाने की भी बहुत आवश्यकता भी है. आज भी देश के नेता केवल उन्हीं मुद्दों पर काम करना चाहते हैं जिनको करने के लिए उन पर बहुत दबाव बन जाता है वरना कानून में संशोधन कोई इतना बड़ा मुद्दा भी नहीं है जिस पर सहमति न बनायीं जा सके.     
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