मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 9 November 2014

बर्द्धमान विस्फोट और गिरफ़्तारी

                                                               देश भर में समय समय पर होने वाली आतंकी गतिविधियों में सबसे ताज़ी बर्द्धमान आतंकी घटना के मास्टरमाइंड बताये जा रहे बांग्लादेशी आतंकी संगठन जमात-उल-मुजहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) के नेता शेख रहमतुल्लाह को हिरासत में लिए जाने के बाद जांच में कुछ प्रगति तो दिखाई देने लगी है तथा पुलिस तथा एनआईए को इस मसले पर आगे बढ़ने में कुछ सफलता भी मिली है. अभी तक इस मामले पर जिस तरह से राज्य और केंद्र सरकार की एजंेसियों के बीच में टकराव दिखाई दे रहा था अब उससे आगे बढ़ने का समय भी आ गया है क्योंकि आरोप प्रत्यारोप से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है तथा पूरी जांच की दिशा भी बदल सकती है. अभी तक इस तरह के मामलों पर पहली बार किसी विदेशी आतंकी संगठन से जुड़े व्यक्ति को गिरफ्तार करने में इस तरह से सुरक्षा बलों को कभी भी सफलता नहीं मिली थी क्योंकि इस केस में शेख को पैसे देने के बहाने से बुलाकर पकड़ने में सफलता मिली है.
                                                         किसी भी आतंकी घटना से जुड़े किसी भी व्यक्ति या संदिग्ध की गिरफ़्तारी से यह साबित नहीं हो जाता है कि वह व्यक्ति ही उस घटना से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है क्योंकि यह सब उन चंद अपुष्ट इनपुट्स पर ही आधारित होता है जिसे हिरासत में लिए गए अन्य लोगों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है. राज्य की ख़ुफ़िया शाखा और एनआईए के साथ ही अभियोजन से जुड़े अन्य सभी लोगों का काम इस तरह की गिरफ्तारियों के बाद ही शुरू होता है पर दुर्भाग्य से देश में कानून की लम्बी प्रक्रिया के कारण ही अभियोग साबित कर पाने में सरकारी तंत्र असफल रहा करता है और आज देश की बहुत सारी जेलों में ऐसे अनगिनत कैदी बंद हैं जिनके अपराध आज तक साबित नहीं हो पाये हैं फिर भी सरकार उन्हें आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के कारण छोड़ना भी नहीं चाहती है. बड़े अपराधों की जांच में किसी भी संदिग्ध को उठा लेने की पुलिसिया पद्धति के कारण भी जाँचें परिणाम तक नहीं पहुँच पा रही हैं.
                                                       देश में आतंकी घटनों के सञ्चालन में लगे हुए लोगों को किसी भी स्तर पर माफ़ नहीं किया जा सकता है पर केवल संदेह के आधार पर किसी को हिरासत में लिए जाने को भी न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है. पुलिस के साथ केंद्रीय जांच एजेंसियों को भी इस तरह के मामलों में मानवीय और कानूनी पहलुओं पर विचार करने की बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि इन्हें केवल डंडे के ज़ोर पर नहीं चलाया जा सकता है. कई बार कुछ निर्दोष भी जांच के दायरे में आ जाते हैं तो उनके विरुद्ध सीधे इस तरह की कड़ी कार्यवाही करने के स्थान पर उन्हें पाबंद कर ज़मानत दे दी जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में वे पुलिस के साथ मिलकर मामलों को सुलझाने में मदद कर सकें. आतंकियों के बड़े सरगना भी अपने को बचाने के लिए नए लोगों का इस्तेमाल धर्म और अन्य बातों के माध्यम से करते हैं जिससे वे काफी हद तक जांच को भटकाने में भी सफल हो जाते हैं. अब समय आ गया है कि इस तरह के मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाये जिससे दोषियों को सजा मिल सके और निर्दोष किसी भी तरह से जेल में न पहुँचने पाएं.       
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