मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 14 December 2014

मेंहदी मसरूर बिस्वास

                                                                      ब्रिटिश चैनेल-४ के एक ख़ुफ़िया ऑपरेशन में जिस तरह से आईएस के सबसे अधिक प्रभावी ट्वीटर हैंडल के संचालक के भारतीय होने की खबर प्रसारित की गयी उसके बाद इंटरनेट की दुनिया के माध्यम से पूरी दुनिया में इन इस्लामी संगठनों के लिए काम करने वाले समाज के शिक्षित वर्ग के बारे में एक गलत अवधारणा बनना स्वाभाविक ही है. आज के आम युवाओं की तरह मुस्लिम युवाओं को भी एक अच्छी नौकरी के साथ समाज में प्रतिष्ठा मिलने की आकांक्षा ही होती है और समाज के लिए बेहतर काम करने वाले लोग आज भी अपने क्षेत्र में बहुत नाम कमा रहे हैं पर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से यह अवधारणा टूटती नज़र आ रही है कि केवल आर्थिक तंगी के कारण ही युवा आतंकी संगठनों की तरफ चले जाते हैं अब उस का पुरज़ोर समर्थन नहीं किया जा सकता है क्योंकि अब पढ़े लिखे और समाज में आज के हिसाब से सफल युवा भी जिस तरह से इन गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं वह पूरे भारतीय मुस्लिम समाज के साथ देश के लिए भी चिंताजनक ही है क्योंकि इस तरह की गतिविधियों में इंटरनेट के माध्यम से कितने लोग सक्रिय हैं यह किसी को भी नहीं पता है पर कारण चाहे जो भी हो मसरूर जैसे लोग आज आतंकियों के हाथों में एक मोहरे से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं.
                                                                    एक मसरूर को अगर हिरासत में ले लिया जाता है तो उससे आईएस पर तो कुछ समय के लिए ही दबाव बनेगा क्योंकि आने वाले समय में उसके पास मसरूर के जैसा काम करने वाला कोई अन्य मोहरा होगा जो अपने देश के मुस्लिम समाज के लिए इसी तरह की समस्याएं खड़ी करेगा. आज जिस तरह से भारतीय मुसलमानों में शिक्षा का स्तर पूरे देश के स्तर तक नहीं है तो उनमें से कितने उच्च शिक्षित युवा मसरूर जैसी नौकरी पा सकते हैं यह भी सोचने का विषय है, जब इतने शिक्षित लोग भी आतंकी जुड़ाव के चलते समाज के निशाने पर आ जायेंगें तो उससे पूरे समाज में मुसलमानों की स्थिति और भी अलग थलग हो जाएगी और संभवतः विश्व भर में काम करने वाले आतंकी संगठन यही करना भी चाहते हैं क्योंकि भारतीय समाज में आज भी मुस्लिम अपने आस पड़ोस से बहुत घुल-मिल कर रहते हैं. सामाजिक ताने बाने को भारत के अनुसार बनाये रखने से जहाँ आतंकियों की चालें सफल नहीं होती हैं वहीं पूरे देश में मुस्लिम युवाओं पर अनावश्यक संदेह करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है.
                                                        इस मामले में कानून अपने ढंग से काम करेगा पर मसरूर के इस कदम के बाद क्या आज उच्च शिक्षा पा रहे मस्लिंम युवाओं को उतनी आसानी से किसी कम्पनी में अच्छी नौकरी मिल पायेगी जैसे खुद मसरूर को मिली थी ? जाने अनजाने मसरूर आईएस के बिछाये उस जाल का शिकार हो ही गया है जो वह भारत में बिछाने की कोशिशें कर रहा है जितनी आसानी से मसरूर को नौकरी मिलने के बाद घर भी मिल गया था क्या अब अपने सपनों को सच करने के लिए उच्च शिक्षा ले रहे मुस्लिम युवाओं को समाज में हर चीज़ उसी तरह से मिल पायेगी तथा खुद मसरूर ने अपने परिवार और मित्रों के लिए जो समस्या खडी कर दी हैं क्या वे उस सदमे से उबर पायेंगें ? पुलिस के बयान के अनुसार वो अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारी के कारण ही आईएस के लिए लड़ाका नहीं बनना चाहता था पर आईएस के साथ नीतिगत मामलों में काम करना चाहता था और उसने यह भी सोच रखा था कि उसे कभी भी पकड़ा नहीं जा सकता है जो कि उसकी बहुत बड़ी भूल थी. अपनी पहचान को बचाने के लिए उसके द्वारा किये गए प्रयासों से आईएस को कोई लेना देना नहीं था और आज वह अपनी इस गतिविधि के लिए संदेह के घेरे में है, जो मसरूर कल तक अपनी कम्पनी के लिए बहुत काम का व्यक्ति था आज वह संदिग्ध बनकर जेल की सलाखों के पीछे है.               
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