मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 9 January 2015

कोयला नीति और औद्योगिक विकास

                                                              लम्बे समय के बाद जिस तरह से देश के कोयला श्रमिक संगठनों की हड़ताल केवल दो दिनों में ही सरकार से बातचीत करने के संकल्प से साथ समाप्त हो गयी उससे यही लगता है कि इस मामले में दोनों पक्षों ने देश हित में कोई सही रास्ता निकालने के बारे में विचार विमर्श करने के लिए आगे बढ़ने की सोच ली है. आज भी देश के प्राकृतिक संसाधनों से लैस परन्तु वास्तविक रूप से गरीब राज्यों में इस समस्या का कोई सही हल नहीं खोजा जा सका है जिससे इन क्षेत्रों में आज भी असंतोष का बोलबाला है और देश में नक्सलियों के सर्वाधिक प्रभाव वाले क्षेत्र भी इन्हीं राज्यों से आते हैं. कोयला उद्योग में आज देश को आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता भी है क्योंकि हमारे पास जितना कोयले का भंडार है उसका हम सही तरह से खनन नहीं कर पा रहे हैं और विदेशों से मंहगा कोयला मंगवाने को मजबूर हो रहे हैं. सही दिशा में चरण बद्ध तरीके से आगे बढ़कर हम इस समस्या का सही हल खोज सकते हैं पर इसमें संवेदनशीलता की कुछ कमी अवश्य ही रह गयी.
                                                  इस दोहरी समस्या से निपटने के लिए सरकार को जिस तरह से काम करने की आवश्यकता थी उसमें केंद्रीय स्तर से हुई घोषणाओं के बाद कोयला मज़दूरों को यह लगने लगा कि उनके हित अब सुरक्षित नहीं रहने वाले हैं तो उन्होंने अपने सबसे प्रभावी हड़ताल वाले अस्त्र का उपयोग करने की सोच ली क्योंकि बिना इसके सरकार भी उनकी बातों को आसानी से नहीं सुनने वाली थी. आज कोयले के खनन में नयी तकनीक आने के बाद उनकी मात्रा और खनन की गुणवत्ता में सुधार होना शुरू हो सकता है पर इस काम के लिए कोयला क्षेत्र में लगी हुई सरकारी क्षेत्र की कम्पनियों सीमित क्षमताएं होने के कारण सरकार ने इस क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोलने की दिशा में काम करना शुरू किया है. खदानों के आवंटन में जिस तरह से पुरानी नीति के चलते फैले भ्रम के कारण जब तक स्थायी और कारगर नीति का निर्माण न किया जा सके कोई भी सरकार इस मामले में मुंह की खा सकती है क्योंकि विदेशों में जो मॉडल कारगर है ज़रूरी नहीं कि वह यहाँ पर भी सफल ही हो जाये.
                                                  सरकार को इस क्षेत्र में श्रमिकों की सहमति लेने के साथ बदलते परिवेश में नए तरीके से काम करने की तरफ बढ़ने के लिए चरण बद्ध कार्यक्रम की घोषणा करनी चाहिए क्योंकि एकदम से आने वाले बदलाव के लिए न तो श्रमिक संगठन तैयार होने वाले हैं और न ही उसके लिए देश में उतने संसाधन भी उपलब्ध हैं. प्रायोगिक तौर पर सरकार को श्रम संगठनों की सहमति से कुछ खदानों को इसके लिए चुनकर उनके आधुनिकीकरण और निजी क्षेत्र की सहभागिता के साथ काम करने को प्राथमिकता देनी चाहिए. आने वाले समय में जब इन खदानों का उदाहरण श्रमिक संगठनों के सामने होगा तो वे अधिक विरोध करने की स्थिति में संभवतः नहीं होंगे. कोयला क्षेत्र बहुत ही बड़ा है और यदि सरकार इसमें केवल निजी क्षेत्र की सहभागिता के स्थान पर इसमें सहकारिता को बढ़ावा देने की तरफ भी सोचे तो सहकारिता के माध्यम से कोयला खदानों के लाभ को चंद लोगों और कम्पनियों के हाथों में जाने के स्थान पर अधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है. महाराष्ट्र और गुजरात में सहकारिता के माध्यम से बहुत बड़े काम किये जा रहे हैं तो इस क्षेत्र को निजी क्षेत्रों के साथ सहकारी क्षेत्र के लिए खोलने की संभावनाओं पर भी विचार किये जाने की कोई भी कोशिश पूरे दृश्य को बदल सकती है.     
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