मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 24 March 2015

पाक-हुर्रियत-कश्मीर और भारत

                                             पाकिस्तान दिवस पर एक बार फिर से जिस तरह से मोदी सरकार की कई तरह की राजनीति और कूटनीति एक साथ ही दिखाई दी उसका देश पर भविष्य में क्या असर पड़ने वाला है यह तो समय ही बताएगा पर भारत सरकार की तरफ से इस तरह के क़दमों से भ्रम की स्थिति ही अधिक बनती है जो भारत पाक सम्बन्धों में पहले से ही बहुत अधिक बढ़ी हुई है. भाजपा और मोदी को एक बात स्पष्ट रूप से समझनी हो होगी कि कश्मीर के मामले में इस तरह की दोहरी नीति का लाभ उठाकर पाकिस्तान केवल भारत के खिलाफ दुनिया भर में माहौल बनाने की कोशिशें ही करने वाला है. कल की पूरी घटना को यदि क्रम से देखा जाये तो कश्मीर को लेकर मोदी सरकार की नीतिगत अस्पष्टता ही अधिक सामने आती है क्योंकि पाक समेत सभी पड़ोसियों से सम्बन्ध सुधारने के लिए जो पहला कदम सरकार की तरफ से उठाया गया था वह बड़ा राजनैतिक और कूटनैतिक दांव लग रहा था था पर घाटी के अलगाववादी नेताओं से दिल्ली में पाक उच्चायुक्त की मुलाक़ात के बाद जिस तरह से पाक से वार्ता रोक दी गयी उसका औचित्य आज तक देश की समझ में नहीं आया है.
                                        पाक द्विपक्षीय राजनयिक और कूटनैतिक मोर्चों के साथ वैश्विक मंचों से कश्मीर का मसला उठाने से कभी भी नहीं चूकता है और यह उसकी उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत वो इस क्षेत्र को विवादित बताने की कोशिशें लगातार ही करता रहता है. आने वाले समय में पाक की इस नीति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होने वाला है पर पाकिस्तान दिवस और अन्य मौकों पर एक बार फिर से भारत सरकार के सामने पहले की तरह समस्याएं ही बनी रहने वाली हैं. पाक ने एक बार फिर से इस आयोजन में घाटी के सभी अलगाववादी नेताओं को बुलाया था और भारत सरकार ने इस पर पहले कोई प्रतिरोध नहीं किया पर जब सरकार के पुरोधाओं को इस बात का अंदाज़ा हुआ तो बयानबाज़ी शुरू कर दी गयी और एक तरह से पाक को फिर से चेतावनी जारी भी की गयी. सरकार को यदि इस तरह की नीति का पोषण करना है जिसमें पाक को भी लगातार उलझाये रखना है और उसको बयान देने के लिए स्वतंत्र ही कर देना है तो फिर किसी भी नीति का क्या मतलब बनता है ? विदेश राज्य मंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष जन. वी के सिंह का चुनाव भी इस आयोजन में भेजने के लिए किया जाना कहाँ तक सही है यह भी मोदी सरकार ही बता सकती है क्योंकि खुद वीके सिंह समारोह में भेजे जाने से अपनी नाराज़गी सांकेतिक तौर से ट्विटर पर बयान करते नज़र आये.
                     देश के जिस किसी भी देश के साथ राजनयिक सम्बन्ध हैं उनके कार्यक्रमों में शामिल होने से भारत की सहिष्णुता ही प्रदर्शित होती है पर पाक के सन्दर्भ में यह सब बहुत उलझा हुआ सा लगता है. यह सही है कि सरकार को इस बात का पूरा हक़ है कि वह किसी भी मंत्री को ऐसे आयोजनों में भेज सकती है पर एक पूर्व सेनाध्यक्ष को अपने प्रतिनिधि के तौर पर भेजकर सरकार सेना और पाकिस्तान के लिए क्या सन्देश देना चाहती है ? खुद वीके सिंह भी इस घटना के बाद आहत लग रहे हैं पर क्या सरकार इसके लिए किसी ऐसे व्यक्ति का चुनाव नहीं कर सकती थी जो इसके लिए अधिक उपयुक्त हो क्योंकि पाक के किसी भी कार्यक्रम में इस तरह से कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के साथ पूर्व सेनाध्यक्ष का पहुंचना किस नीति का हिस्सा है ? सरकार इस मामले में कुछ और कठोर होकर पीएमओ के मंत्री जितेंद्र सिंह को भेज सकती थी जो कि खुद जम्मू क्षेत्र से आते हैं तो कम से कम वीके सिंह का दर्द तो कम किया जा सकता है या फिर इस आयोजन के लिए खुद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भेजा जाना चाहिए था जिनकी अटल सरकार के समय से भी सही छवि रही है और वे पूर्णतः राजनेता भी हैं. खैर सरकार का यह कदम उसके लिए एक बार फिर से आलोचनाओं का नया पिटारा लेकर सामने आया है और आने वाले समय में शिवसेना और एनडीए के अन्य सहयोगी इस मामले में किस तरह का व्यवहार करते हैं यह भी देखने का विषय होगा.   
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