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Wednesday, 4 March 2015

मोदी सरकार की कार्यशैली

                                                      लोकसभा में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता संभाल रही मोदी सरकार की कार्यशैली ही कई बार उसके लिए संकट का कारण बन जाया करती है इसका उदाहरण एक बार फिर से कल राज्यसभा में दिखाई दिया जब राष्ट्रपति के अभिभाषण को ध्वनिमत से पारित करवाने के स्थान पर सीताराम येचुरी मत विभाजन पर अड़ गए और उसके कारण सरकार को विपक्ष के संशोधन के लिए बाध्य होना पड़ा जिसमें उसे यह जोड़ना पड़ा कि सरकार काले धन को लाने में विफल रही है. वैसे देखा जाये तो राज्य सभा में यह घटना चौथी बार हुई है जब विपक्ष के संशोधन को इस तरह से जोड़ने के लिए सरकार को बाध्य होना पड़ा है. इससे पहले यह १९८०, १९८९ और २००१ में भी हो चुका है पर इस बार का संशोधन सरकार के लिए सबसे बुरा है क्योंकि यह सरकार काले धन को वापस लाये जाने के लिए काम करने की दिशा में आगे बढ़ रही है फिर भी उसे इस तरह के संशोधन को मजबूरी में अपनी विफलता के रूप में जोड़ना पड़ा है हालाँकि कुछ अन्य संशोधनों को सरकार की तरह से निवेदन किये जाने पर वापस ले लिया गया था पर सीताराम येचुरी को सरकार नहीं समझा सकी.
                                                       इस पूरी घटना में सरकार के संसदीय कार्य मंत्री की कुशलता पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है क्योंकि की वर्तमान सत्र के अतिरिक्त भी कई बार सरकार का फ्लोर मैनेजमेंट इसी तरह से बिगड़ता हुआ दिखाई देता है और उसको संभाल पाना किसी के बस में नहीं रह जाता है. आखिर इस सबके पीछे क्या कारण काम कर रहे हैं यदि इस पर गौर सेदेखा जाये तो एक बात सामने आती है कि सदन में खुद पीएम की तरफ से आज तक विपक्षी नेताओं और पार्टियों पर अनावश्यक हमले बंद नहीं किये गए हैं जिससे विपक्ष परम्पराओं की तुलना में कई बार सदन के नियमों पर अड़ जाता है और मंत्री की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान तो लगा ही जाता है. सरकार की तरफ से सदन के अंदर माहौल अच्छा बनाये रखने के लिए जिस स्तर पर सक्रियता की आवश्यकता होती है वह कहीं से भी दिखाई नहीं देती है. निसंदेह सरकार के पास लोकसभा में प्रचंड बहुमत है पर उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए की समय आने पर उसे राज्यसभा में असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जिसके लिये उसके पास अनुभव की कमी साफ़ झलकती है और मंत्रियों का हर बात के लिए पीएम पर निर्भर रहना भी कई बार सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर देता है.
                         इसके साथ ही सरकार का सदन के बाहर का एक निर्णय/प्रस्ताव भी सरकार की एकतरफा कार्यशैली को दर्शाता है जिसमें द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिए राष्ट्रपति को इस वर्ष छह देशों की यात्रा का प्रस्ताव किया गया है. इस सूची में इज़राइल का नाम होने के बाद राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ से यह कहा गया है कि वे केवल इज़राइल की यात्रा पर नहीं जा सकते हैं और यदि वहां जाना आवश्यक ही है तो वे फिलिस्तीन की यात्रा भी साथ ही करना चाहेंगे. किसी भी देश के साथ संबंधों को मज़बूत बनाने का ज़िम्मा तो सरकार पर ही होता है पर इन सब बातों के इतने व्यापक रूप से सामने आने के पहले ही सरकार को राष्ट्रपति कार्यालय से विमर्श कर लेना चाहिए था. प्रणब मुखर्जी जिस तरह इंदिरा गांधी के समय से चली आ रही नीति पर विश्वास करने वाले लोगों में से हैं तो सरकार को भी उनकी मंशा जानकार ही आगे बढ़ने पर सोचना चाहिए था परन्तु पता नहीं क्यों सरकार प्रणब मुखर्जी को भी केवल मोहर मात्र ही मान रही है और उनको भी अपनी सुविधा के अनुसार उपयोग करना चाहती है. देश की फिलिस्तीन नीति लम्बे समय से चली आ रही है और मोदी सरकार ने भी उसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है फिर अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर थोड़ी और सजगता के साथ बढ़कर सरकार अपने और राष्ट्रीय हितों को आसानी से साध सकती है.             
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