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Thursday, 9 April 2015

कश्मीरी पंडित और कश्मीरी राजनीति

                                कश्मीरी पंडितों के घाटी में फिर से बसाये जाने को लेकर लगातार बयान जारी करने वाली भाजपा के सामने अब एक नयी तरह की समस्या आ गयी है क्योंकि अपने चुनावी भाषणों में पार्टी के नेता लगातार इस बात को बहुत मज़बूती के साथ लगातार कहते रहे हैं कि केंद्र और जम्मू कश्मीर में उनकी सरकार होने पर वे घाटी से विस्थापित हुए पंडितों के लिए पूर्ण सुरक्षा वाली कॉलोनियां बनायेगें जिनमें घाटी जाने के इच्छुक इन कश्मीरी पंडितों के परिवारों को फिर से बसाया जायेगा. राज्य के सीएम मुफ़्ती मोहम्मद सईद के अपनी दिल्ली यात्रा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह को दिए गए आश्वासन के एक दिन बाद ही घाटी में राजनीति कुछ इस तरह से बदली कि मुफ़्ती सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े और यह कहना पड़ा कि अब सरकार कश्मीरी पंडितों को उनके मूल स्थान पर ही बसाएगी. घाटी के पंडितों की अलग कॉलोनियों के मसले पर जिस तरह से घाटी के राजनैतिक दलों के साथ अलगाववादियों द्वारा भी विरोध के सुर अलापे गए तो केवल घाटी के भरोसे ही सत्ता में आये मुफ़्ती के लिए इसकी अनदेखी करना नामुमकिन हो गया था.
                   जो भी कश्मीरी पंडित घाटी में वापसी के साथ अपने मूल घरों में जाना चाहते हैं उनके पुनर्वास के लिए सही नीति बनाकर आगे बढ़ने की ज़रुरत है क्योंकि कई बार चुनावी बातें इतनी हवाई होती हैं कि उनका धरातल से कोई वास्ता नहीं होता है और आज कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास में वही सब फिर से दिखाई देने लगा है. आज जो कश्मीरी अलगाववादी पंडितों को पुराने मोहल्लों में बसाये जाने की बात कर रहे हैं क्या वे इनकी सुरक्षा की कोई बात भी करते नज़र आ रहे हैं क्योंकि १९८९ में मुफ़्ती मोहम्मद सईद के गृह मंत्री रहते ही कश्मीरी पंडितों पर सबसे अधिक अत्याचार किये गए थे जिससे वे घाटी छोड़ने को मज़बूर हो गए थे और आज भी वे देश के विभिन्न हिस्सों में दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं क्योंकि उनकी सम्पन्नता उनके विस्थापन के साथ ही खत्म हो गयी थी. आज विस्थापन के बाद एक नयी पीढ़ी सामने आ चुकी है जिसने कश्मीर से बाहर ही जन्म लिया है और जो कश्मीर की केवल कहानियां सुनकर ही बड़ी हुई है तो उसके लिए इतनी विपरीत परिस्थितियों में घाटी में वापस जाने का क्या औचित्य होगा जहाँ पर कश्मीरी वेश में ही उनकी हत्या करने के लिए कुछ सरफिरे तैयार बैठे हैं ? इस मुद्दे को राजनीति से आगे बढ़कर मानवीयता के आधार पर समझने की आवश्यकता है पर दुर्भाग्य से आज जिहाद में लगे हुए लोग मानवता के सबसे बड़े दुर्श्मन बने हुए हैं.
                  जिन कश्मीरी पंडितों की सम्पत्तियों को अन्य स्थानीय लोगों द्वारा कब्ज़े में ले लिया गया है सबसे पहले तो सरकार केंद्र सरकार को राज्य सरकार के सहयोग से उसका एक अलग विभाग बनाये जाने के बारे में प्रयास करना चाहिए फिर सरकारी स्तर पर उनकी सम्पत्तियों से होने वाली किसी भी तरह की आय को इस पीड़ित पंडितों तक पहुँचाने की सही व्यवस्था भी करनी चाहिए जिससे देश के अन्य हिस्सों में बसे हुए इन लोगों के लिए आय के साधन सुधारे जा सकें. अपनी मिटटी से दूर होने पर और व्यावसायिक रूप से सब कुछ खो देने के बाद आज इन कश्मीरी पंडितों की सम्पत्तियों पर नाजायज़ कब्ज़े जमकर जो लोग बैठे हुए हैं उनका क्या किया जाना चाहिए ? घाटी के लोग आज कश्मीरियों को उनके पुराने घरों में भेजने की बात तो कर रहे हैं पर क्या वे उनको वे घर वापस दिलवा पायेंगें जो उनके घाटी छोड़ने के बाद आज दूसरों के कब्ज़े में हैं शुरुवात करने के लिए इनकी सम्पत्तियों को १९८९ के स्तर पर वापस लाने की बात की जानी चाहिए जिससे वापसी के इच्छुक लोगों को कुछ सही तरह की उम्मीद दिखाई दे सके. जब सरकारें इस तरह का काम कर चुकें तब उन्हें पंडितों की घर वापसी के बारे में बातें करनी चाहिए वर्ना खोखली दलीलों से कश्मीरी पंडितों के साथ हर तरह का खिलवाड़ अब बंद किया जाना चाहिए.             
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