मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 8 April 2015

६ से ९ सिर्फ मराठी फिल्म ?

                                              लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए कई बार हमारे देश में नेता लोग किस तरह के आदेश जारी कर दिया करते हैं जो किसी भी तरह से व्यवहारिक और आर्थिक रूप से सही नहीं कहे जा सकते हैं इसका ताज़ा उदाहरण महाराष्ट्र सरकार द्वारा मल्टीप्लेक्स में शाम ६ से ९ के शो में केवल मराठी फिल्मों के प्रदर्शन के आदेश से समझा जा सकता है. भाषाएँ देश, समाज और राष्ट्रों को जोड़ने का काम किया करती हैं पर भारत में यह सदैव से ही राजनीति का विषय रहा करती हैं. किसी भी राज्य सरकार द्वारा स्थानीय भाषा के प्रचार के लिए उठाये जाने वाले सभी कदमों का आम तौर पर स्वागत ही किया जाता है पर कई बार शुद्ध व्यवसाय में लगे हुए लोगों के लिए सरकारों के इस तरह के निर्णयों के अनुपालन में कई तरह की व्यवहारिक समस्याएं सामने सामने आने लगती हैं. मुंबई किसी भी तरह से क्या केवल मराठी भाषा के दम पर अपनी वैश्विक पहचान बना सकती है इस बात का किसी भी मराठी नेता के पास कोई उत्तर नहीं होगा पर स्थानीय राजनीति में शिवसेना को पछाड़ने के लिए भाजपा खुद को आज मराठी भाषा का हितैषी साबित करने में लगी हुई है.
                                   मुंबई सही मायनों में भारत का विविधताओं से भरा हुआ वह प्राचीन शहर है जिसने विश्व भर में अपनी पहचान बनाने के साथ अपनी स्थानीय छवि को स्वेच्छा से आत्मसात किये रखा वर्ना आज़ादी से पहले जिस तरह से इस शहर पर विदेशियों का प्रभाव रहा था तो उसे देखते हुए इसकी मराठी पहचान कब की ही समाप्त हो जानी चाहिए थी पर क्या ऐसा हुआ ? नहीं क्योंकि मराठाओं की पहचान का इस सबसे कोई सम्बन्ध कभी भी नहीं जिसके चलते आज यह शहर सही अर्थों में वैश्विक महानगरों में गिना जाता है फिर जब भी नेताओं की पकड़ स्थानीय कारणों से जनता पर कमज़ोर होती नज़र आई और उनके पास मज़बूत मुद्दे नहीं बचे तो उन्होंने अपने प्रभाव को बचाये रखने के लिए भाषा की राजनीति शुरू कर दी जिसका इस तरह का परिणाम आज सबके सामने आ रहा है. मुंबई अपने आप में भारत के सिनेमा जगत की सम्पूर्ण पहचान भी है तो देश दुनिया को भारतीय भाषाओं की फिल्मों के माध्यम से मनोरंजन और सीख प्रदान करने वाले इस उद्योग पर इस तरह की बंदिशें लगाकर आखिर नेता क्या साबित करना चाहते हैं. कोई भी दल हो पर उसे मनोरंजन आदि में इस तरह से भाषा की अनावश्यक घुसपैठ कराने से बचना ही चाहिए पर दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं है.
                                सरकारी कानून से बंधे हुए मल्टीप्लेक्स संचालकों के पास इस आदेश के बाद करने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहने वाला है क्योंकि वे सरकार के आदेशों का अनुपालन करने को बाध्य हैं और यदि किसी संचालक द्वारा इससे अलग चलने की कोशिश की जाती है तो भाषा के कथित कट्टर और अराजक समर्थक उनको आर्थिक क्षति पहुँचाने से बाज़ नहीं आने वाले हैं और भाषा का मुद्दा सामने आने पर बड़ी से बड़ी मज़बूत सरकारें भी मिमियाने लगती हैं क्योंकि उनको अपने वोटबैंक को संभाल कर सखना होता है. संचालकों को इस सबसे आर्थिक नुकसान अवश्य ही होना है क्योंकि इस शो का समय सभी को सही लगता है और देश दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आये हुए लोग जब इस समय मल्टीप्लेक्स जाने से कतराने लगेंगें तो उसका कुछ न कुछ आर्थिक दुष्प्रभाव भी दिखाई देने लगेगा. सरकार यदि इस तरह से भाषा का वास्तव में प्रचार प्रसार बढ़ाना ही चाहती है तो उसे कानूनन आवश्यक बनाये जाने के स्थान पर इस समय मराठी भाषा की फिल्म दिखाने वाले संचालकों को टैक्स आदि में विशेष छूट देने का प्रावधान करना चाहिए जिससे जो लोग इसे दिखाना चाहे वे दिखाएँ और बाकियों के पास कुछ भी दिखाने का अधिकार सुरक्षित भी होना चाहिए. फिलहाल तो सरकार मायानगरी को राजनीति में उलझाकर यहाँ आने वाले गैर-मराठी लोगों को एक तरह से मल्टीप्लेक्स में जाने से रोकने का ही काम करती दिखाई दे रही है.      
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