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Thursday, 16 July 2015

नीति आयोग और भूमि अधिग्रहण

                                     कहने को एक क्रन्तिकारी बदलाव के तहत नीति आयोग का गठन योजना आयोग के स्थान पर किया गया है पर जिस तरह से मोदी सरकार ने संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही इसकी पूर्ण बैठक का आयोजन किया उससे यही पता चलता है कि वह इस मंच एक उपयोग भी अपने राजनैतिक हितों को साधने के काम में करना चाहती है. इस तरह की किसी भी परिस्थिति में केवल पीएम मोदी के चहेते लोगों के अतिरिक्त विपक्ष समेत राजग में भी इस नए भूमि अधिग्रहण कानून का खुला विरोध किया जा रहा है तो क्या मोदी सरकार के इस मुद्दे पर अड़ने का कोई मतलब बनता है ? बैठक के बाद जिस तरह से सरकार की चिंता केवल भूमि अधिग्रहण बिल पर ही अधिक टिकी नज़र आई उससे भी उसकी नीति आयोग की प्राथमिकताएं पता चल जाती हैं. जैसा कि पहले से ही अनुमान लगाया जा रहा था कि संसद से सड़क तक इस विधेयक का खुला विरोध कर चुकी कांग्रेस के सीएम बैठक से बाहर ही रहने वाले हैं वैसा ही हुआ भी क्योंकि सरकार की तरफ से जिस तरह से इस मुद्दे से निपटने के प्रयास किये जा रहे हैं वे कहीं से भी पूरी तरह लोकतान्त्रिक भी नहीं कहे जा सकते हैं.
                                बैठक के बाद जिस तरह से एक बार फिर से पीएम और जेटली की तरफ से भूमि अधिग्रहण बिल के पारित न हो पाने से वही पुरानी बातें दोहराई गयीं जो पिछले वर्ष से दोहराई जा रही हैं तो उससे यही पता चलता है कि सरकार की प्राथमिकता के लिए यह बिल कितना आवश्यक है. जिस तरह से इस बिल के पारित न होने से विकास के रुकने के दावे किये जा रहे हैं वे कहीं से भी उतने सच नहीं हैं क्योंकि अब खुद जेटली के अनुसार कुछ ऐसे राज्य भी सामने आये हैं जो खुद के बताये गए संशोधनों के भी खिलाफ बोलने लगे हैं ? कांग्रेस के सीएम इस बैठक में थे नहीं तो जेटली को यह भी स्पष्ट करना चाहिए था कि किन राज्यों को अब किन बातों पर नए सिरे से आपत्ति है ? जहाँ तक सरकार इस बात को कहने में नहीं चूकती है कि २०१३ के विधेयक के बाद से भूमि न मिलने से कई परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं तो उसका भी कोई मतलब नहीं बनता है क्योंकि जब तक किसानों के हितों की बात के बिना आगे बढ़ने की कोशिश की जाती रहेंगीं तब तक भट्टा पारसौल जैसी घटनाएँ भी होती ही रहने वाली हैं. मोदी सरकार २०१३ के बिल के चलते अस्पताल, स्कूल न बन पाने का रोना भी रोती हुई नज़र आती हैं जबकि इन दोनों के लिए कितनी भूमि चाहिए होती हैं यह सभी को पता है और इन मदों में कई बार भूमि देने में लोग खुद भी बहुत जल्दी करते हैं.
                          अब भी समय है कि मोदी सरकार अपने इस जन विरोधी बिल पर व्यापक चर्चा करे जिससे देश के सामने बिल का और भी अच्छा प्रारूप लाया जा सके फिलहाल तो मानसून सत्र में मोदी सरकार इस बिल पर ज़्यादा दबाव देने की स्थिति में नहीं है क्योंकि आर्थिक रुप से पिछड़े पर राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील बिहार के चुनावों में भाजपा कोई भी गलत दांव नहीं खेलना चाहती है. खुद पीएम के रुप में मोदी को कसौटी पर कसने का मौका भाजपा को इस चुनाव में ही मिलने वाला है और जनता इस मुद्दे पर क्या सोच रही है यह अभी नहीं कहा जा सकता है तो विभिन्न दलों के कट्टर समर्थकों के अतिरिक्त हवा के साथ बहने वाले मतदाताओं के सामने भाजपा भी अपने को किसी भी स्थिति में कमज़ोर साबित नहीं करना चाहेगी. बिहार में बिना इस तरह के कड़े प्रावधानों के भी नितीश सरकार का काम औसत से अच्छा ही कहा जा रहा है तो मोदी के सामने उनकी छवि से निपटने की चिंता भी है जो उनको फिलहाल किसी कठोर कदम उठाने की तरफ जाने से रोकने ही वाली है. यदि बिहार भी भाजपा की झोली में आ जाता है तो उसके बाद मोदी सरकार संसद का विशेष संयुक्त सत्र बुलाकर भी भूमि अधिग्रहण बिल को पारित करवाने के बारे में सोच सकती है अन्यथा उसके लिए यह बिल एक सरदर्द ही बना रहने वाला है.      
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