मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 16 August 2015

रेल सुधार का राजग स्वरुप

                                                      बढ़ते हुए वैश्विक बाज़ारीकरण के परिदृश्य में जिस तरह से भारतीय रेल को एक बार फिर से निजीकरण की तरफ बढ़ाने का प्रयास मोदी सरकार द्वारा शुरू किया गया है उसके बाद से ही रेलवे कर्मचारी संगठनों में काफी सुगबुगाहट देखी जा सकती है. बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में गठित की गयी कमिटी की सिफारिशें सामने आने के बाद स्थिति और भी बिगड़ सकती है क्योंकि आज भी भारतीय रेल लाभकारी संस्था से अधिक देश की सेवा करने वाले संस्थानों में गिनी जाती है. आज इस क्षेत्र में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है उसके वैश्विक स्तर पर मिले रेल परिचालन में मिले अनुभवों के आधार पर आगे बढ़ने की कोशिशें ही देश को सही रेल व्यवस्था दे सकती हैं. राजग सरकारें चाहे वे अटल की हों या अब मोदी की उनका सदैव से ही यही रुख रहा है कि सरकार को इस तरह से बाजार से जुडी हुए कामों में दखल नहीं देना चाहिए जिससे वे स्वयं ही आगे बढ़ सकें और प्रतिस्पर्धा भी कर सकें पर निजीकरण के बाद दुनिया के अधिकतर देशों की रेलों को एक बार फिर से बहुत अधिक घाटे के कारण फिर से सरकारी क्षेत्र में लाने की कोशिशें और मांग की जाने लगी हैं तो उस स्थिति में भारतीय रेल के निजीकरण के बारे में सोचना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है ?
                                 रेलवे में भी निजीकरण का आँखें बंद कर विरोध किया जाना भी उचित नहीं है क्योंकि आज जब आर्थिक संसाधन जुटाने की बातें सामने आ रही हैं तो उस परिस्थिति में सरकार के पास और विकल्प भी सीमित हो रहे हैं पर आखिर कब तक सरकार इस तरह के क्षेत्रों का निजीकरण करती रहेगी और आने वाले समय में जनता को एक बार फिर से निजी कम्पनियों के हाथों लुटने के लिए छोड़ देगी ? आज हमारे पास रेल का जो नेटवर्क उपलब्ध है यदि रेलवे अपने स्तर से प्रयास करते हुए उसे सुधारने के लिए संकल्पित हो जाये और इसके लिए जोनल रेलवे के बीच मुक़ाबला भी शुरू करा दिया जाये तो आने वाले समय में इस प्रतिस्पर्धा का अच्छा असर पूरी व्यवस्था पर पड़ना अवश्यम्भावी है. सरकार के माध्यम से जो पूँजी का प्रवाह शुरू किया जा सकता है वह निजी क्षेत्र द्वारा कभी भी संभव नहीं है क्योंकि सरकारी क्षेत्र का लाभ समाज के हर स्तर तक पहुँचता है पर निजी क्षेत्र के केवल अपने लाभ तक ही सोच पाता है. देश के लिए लम्बे समय की योजनाओं को बनाते समय सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि रेलवे कितने लोगों को रोज़गार देता है और नयी शर्तों के बाद कितने लोग आने वाले समय में इसके साथ काम कर पायेंगें यह भी आवश्यक है.
                              सबसे पहले सीमित संख्या में किसी काम को निजी क्षेत्र के हाथों में दिया जाना चाहिए क्योंकि एकदम से किसी भी काम में बदलाव से व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है जहाँ पर सीधे परिचालन से बातें नहीं जुडी हुई हैं वहीं पर पहले शुरुवात करनी चाहिए. ज़ोनल स्तर पर अधिकारियों की ज़िम्मेदारी को निर्धारित करते हुए रेलवे के परिचालन से उनके भविष्य को जोड़ देना चाहिए जिससे आने वाले समय में अधिकारी भी रेलवे नेटवर्क पर दिखाई देने शुरू हो जाएँ व्यवस्था केवल उनके दौरों से भी काफी हद तक सुलझ सकती है और उनके इस तरह से यात्रा करने के कारण किसी पर कोई प्रभाव भी नहीं पड़ने वाला है. रेलवे को पूरे देश में जनपद स्तर पर एक रेल शिकायत / सुधार समिति को गठित करने के बारे में भी सोचना चाहिए जिससे स्थानीय लोगों की समस्याएं भी रेलवे तक पहुँच सकें तथा इस बात को देखने के लिए एक तंत्र भी बनाया जाना आवश्यक है जिसके माध्यम से यह देखा जा सके कि जनता की इस समिति के सुझावों पर क्या क्या किया जा रहा है ? निजी क्षेत्र एक हद तक ही रेलवे का सहायक बन सकता है पूरी तरह से व्यवस्था उन्हें सौंपे जाने से जनता के लिए समस्याएं बढ़ने ही वाली है और इतने बड़े कर्मचारियों के संगठन से निपट पाने के लिए क्या मोदी सरकार तैयार भी है क्योंकि पिछले वर्ष पीएम के वाराणसी दौरे के समय संभावित विरोध को देखते हुए ही कर्मचारियों को आश्वासन दिया गया था और खुद पीएम ने भी इस तरह की ख़बरों का खंडन भी किया था.     
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